हो सकता हे चीन ने इन्हें कुछ आनंद मई वस्तुएं उपहारस्वरूप भेंट की हों और यह अधिकार फलस्वरूप मिल गया हो ………………………

चौधरी धीरेन's photo.

मोदीजी देश देश जाकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट मांग रहे हैं
आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट के लिए भारत तरस रहा है।

लेकिन क्या आप जानते हैं की 1953 में भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव अमेरिका ने भारत को दिया था जिसे जवाहर लाल नेहरू ने ठुकरा दिया । इसकी जगह नेहरू ने चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने की सलाह दे डाली और चीन विश्व शक्ति बन गया। अगर नेहरू ने उस पेशकश को स्वीकार कर लिया होता तो कई दशकों पहले भारत सामरिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद मजबूत देश के तौर पर उभर चुका होता।
जवाहर लाल नेहरू की गद्दारी का सिलसिला यहीं नहीं थमा।
आधा कश्मीर पाकिस्तान को दे कर और बचे हुए कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के बाद, नेहरू ने 29 अप्रैल 1954 को चीन के साथ पंचशील के सिद्धांत पर समझौता किया।
इस समझौते के साथ ही भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया था। नेहरू ने तिब्बत को भरोसे में लिए बिना उस पर चीन के ‘कब्जे’ को मंजूरी दे दी।भारत के इस समझौते के बाद से ही हिमालय में भू-राजनैतिक हालात हमेशा के लिए बदल गए। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत में अपने विस्तार का जो सिलसिला शुरू किया, वह आज भी जारी है।
तिब्बत में चीन के पांव पसारने का नतीजा यह हुआ है कि आज उसके हौसले बुलंद हैं और वह न सिर्फ गाहे ब गाहे वास्तविक नियंत्रण रेखा का उल्लंघन कर रहा है बल्कि अरुणाचल प्रदेश को चीन का दक्षिणी हिस्सा बताता है। नेहरू की वह गलती आज भारत पर बहुत भारी पड़ रही है।

Advertisements