In Search of Reality of ‪#‎Nehru‬.

Govind Lal's photo.

In Search of Reality of ‪#‎Nehru‬
1. संलग्न तस्वीर में बायीं तरफ उपर नेहरु के दादा जी का तस्वीर है जो आनंद भवन में लगा है और जिसपर लिखा है “जवाहर लाल नेहरु के दादा गंगाधर नेहरु”. ये १८५७ के विप्लव के पूर्व दिल्ली के कोतवाल थे. नेहरु ने अपने जीवनी में इनके बारे में लिखा है,
“My grandfather, Ganga Dhar Nehru, was Kotwal of Delhi for some time before the great revolt of 1857.” (pg.2)
मुगल रिकॉर्ड से पता चलता है की १८५७ के विप्लव के समय और उससे पहले कोई भी हिंदू दिल्ली का कोतवाल नही था. उस समय दिल्ली का कोतवाल था गयासुद्दीन गाजी. यह दिल्ली में मुगलों का अंतिम कोतवाल था. तत्कालीन इतिहास से जानकारी मिलती है की अंग्रेज सैनिक इसे ढूढ रहे थे और यह अपनी जान बचाने के लिए सपरिवार आगरा की ओर भाग गया था.
नेहरु ने अपनी जीवनी में लिखा है, “The Revolt of 1857 put an end to our family’s connection with Delhi…The family, having lost nearly all it possessed, joined the numerous fugitives who were leaving the old imperial city and went to Agra. He (Gangadhar) died at the early age of 34 in 1861” (pg.2)
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है की गियासुद्दीन गाजी और गंगाधर नेहरु दोनों एक ही व्यक्ति हो सकता है. १८५७ में विप्लव के समय जब अंग्रेज सैनिक इन्हें ढूंड रहे थे तो अपनी जान बचाने के लिए आगरा की ओर भाग गए साथ ही अपना पहचान छुपाने के लिए अपना नाम भी बदल लिए और पहचान भी क्योंकि बाद में इनके परिवार का और कोई भी सदस्य गंगाधर के जैसा लिवास पहने नहीं दीखता है. यह वैसा ही है जैसे की १९८४ के सिक्ख दंगे के समय अल्पसंख्यक क्षेत्रों में सिक्खों ने अपने बाल मुंडवा लिए और पगड़ी बांधना छोड़ दिए थे. परन्तु देखनेवाली बात यह है की गियासुद्दीन ने छद्म नाम गंगाधर हिन्दुवाला तो रख लिया परन्तु सर नेम किसी हिंदू का नही रखा शायद इसलिए की सर नेम खानदान को व्यक्त करता है. इसलिए एक नया सर नेम ‘नेहरु’ रख लिया ताकि जरुरत पड़ने पर यथापरिस्थिति लोगों को संशय में डाल सके और अपनी वास्तविक पहचान छुपा सकें. नेहरु सर नेम की उत्पति पर नेहरु ने अपनी जीवनी में लिखा है, “A jagir with a house situated on the banks of canal had been granted …and, from the fact of this residence, ‘Nehru’ (from nahar, a canal) came to be attached to his name.” (pg.1)
2. नेहरु ने अपने पिता मोतीलाल नेहरु के शिक्षा के बारे में लिखा है, “His early education was confined entirely to Persian and Arabic and he only began learning English in his early teens.” (pg.3)
प्रश्न उठता है की जब नेहरु पंडित थे तो उन्हें संस्कृत की शिक्षा तो अवश्य दी जानी चाहिए थी भले ही उन्हें अरबी फारसी भी पढाया जाता. परन्तु उन्हें संस्कृत की शिक्षा ही नही दी गयी. इतना ही नही नेहरु ने अपने जीवनी में कई ऐसे घटनाओं का उल्लेख किया है जो दर्शाता है की पिता मोतीलाल या उनके चाचा और चचेरे भाईओं के दिल में हिंदू धर्म, हिंदुओं के भगवान और हिंदू कर्मकांड में कोई दिलचस्पी नही थी. इससे स्पष्ट होता है की ‘नेहरु’ पंडित तो क्या हिंदू भी नही थे. एक स्थान पर नेहरु लिखते है, “Of religion I had very hazy notions. It seemed to be a woman’s affair. Father and my older cousins treated the religious question humorously and refused to take it seriously.”
३. नेहरु ने अपने जीवनी में लिखा है मेरा जन्म १४ नवम्बर, १८८९ को इलाहाबाद में हुआ, पर उन्होंने यह नही बताया की इलाहबाद में किस जगह हुआ था. मैं जब इलाहबाद में था तो हिंदुस्तान दैनिक में एक लेख छपा था और उससे पता चला की नेहरु का जन्म इलाहबाद के मीरगंज इलाके में हुआ था. लेख में उनके घर की तस्वीर भी दी हुई थी जो एक सामान्य सा दो मंजिला घर था. मुझे लगा मुझे यहाँ से कुछ बेहतर जानकारी मिल सकती है इसलिए मैं वहाँ जाने को उत्सुक हुआ, पर यह जानकर हैरान रह गया की मीरगंज इलाका रेड लाईट एरिया था. मुझे आश्चर्य हुआ की इतने बड़े व्यक्ति का जन्मस्थान वेश्यालय कैसे बन गया, परन्तु जब मैंने इस बाबत जानकारी इकट्ठी करनी शुरू की तो पता चला की वो बहुत पहले से रेड लाईट एरिया था और मोतीलाल रेड लाईट एरिया में ही रहते थे.
इसी दौरान मुझे एक नई जानकारी मिली की जवाहर लाल नेहरु के असली पिता मुबारक अली था. मेरे पास इस बात के कोई साबुत नही है और हो भी नही सकता है, परन्तु मैं निम्नलिखित कारणों से इस बात से इतिफाक रखता हु:
• मुबारक अली एक वकील था और वह मोतीलाल के घर आया करता था.
• १८५७ के विप्लव में सबकुछ गंवाने के बाद नेहरु परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो चुकी थी, शायद इसीलिए वे रेड लाईट एरिया में भी रह रहे थे.
• मुबारक अली एक अय्याश किस्म का व्यक्ति था. मोतीलाल का रेड लाईट एरिया में रहना और खराब आर्थिक स्थिति में कुछ भी असम्भव नही है.
• मोतीलाल को ‘इशरत मंजिल’ मुबारक अली से मिला था जिसका नाम मोतीलाल ने ‘आनंद भवन’ रखा था
• नेहरु लिखते है की जब वे दशवें वर्ष में थे तो वे पुराने मकान से नए मकान ‘आनंद भवन’ में आये थे. मुबारक अली से नेहरु आनंद भवन आने से पूर्व परिचित थे और मुबारक अली आनंद भवन आता जाता रहता था और नेहरु को बेटे जैसा प्यार करता था.
• नेहरु ने मुबारक अली के बारे में अपने जीवनी में लिखा है, “He came from a well-to-do family of Badaun….and for me he was a sure haven of refuge whenever I was unhappy or in trouble. I used to snuggle up to him and listen, wide-eyed, by the hour to his innumerable stories……and the memory of him still remains with me as a dear and precious possession.”
• नेहरु ने खुद स्वीकार किया है की उनका हिंदु होना महज एक दुर्घटना है और उनके संस्कार मुस्लिम के हैं.
• जवाहर अरबी शब्द है जो एक कीमती पत्थर को व्यक्त करता है. कोई हिंदू और वो भी पंडित अपने पुत्र का नाम अरबी क्यों रखेगा.
४. हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति के विषय में नेहरु के विचार कितने निम्न स्तर के थे और हिंदू धर्म के प्रति उनके दिल में कितना विद्वेष था यह उनके निम्नलिखित कथन से झलकता है:
“Hindu culture would injure India’s interests. By education I am an Englishman, by views an internationalist, by culture a Muslim, and I am a Hindu only by accident of birth. The ideology of Hindu Dharma is completely out of tune with the present times and if it took root in India, it would smash the country to pieces. [Source:Violation of Hindu HR-Need for a Hindu nation-III by V Sunderam (Retd. IAS Officer), originally in “Reminiscences of the Nehru Age” by M.O. Mathai]
भारतीय सभ्यता, संस्कृति और सनातन धर्म जो विश्व की प्राचीनतम और महानतम सभ्यता, संस्कृति और धर्मों में से एक है, जो जियो और जीने दो, वसुधैव कुटुम्बकम और सत्यमेव जयते जैसे आदर्शों पर आधारित है, के विषय में कोई हिंदू तो क्या इसे समझने वाला कोई भी इस प्रकार की सोच नही रख सकता है. इन्हें इस बात का डर था की यदि हिंदू धर्म ने अपनी जड़े जमा ली तो देश के टुकड़े हो जायेंगे. ये ठीक वैसा ही जैसे आज राहुल गाँधी कहता है की भारत को लश्कर ऐ तोइबा से ज्यादा हिंदू कट्टरवाद से खतरा है. सवाल है देश के टुकड़े होने से उनका तात्पर्य क्या था? मेरा मानना है, उन्हें लगता था की यदि हिंदू धर्म अपनी जड़ें मजबूती से जमा लेती है तो भारत अखंड मुस्लिम राज्य नही बन सकेगा और हिंदू अपने लिए हिंदुस्तान ले लेगा और भारत के टुकड़े हो जायेंगे. शायद आपको मेरी सोच पर तरस आ रही होगी, लेकिन मेरे इस सोच का पर्याप्त आधार है और आप भी देख लीजिए….
५. नेहरु का कहना है की उनका खानदान फर्रुखशियर का कृपा प्राप्त कर उसी के समय (१७१६ ईस्वी) कश्मीर छोडकर मुगलों की सेवा के लिए दिल्ली आ बसे थे. वे अपनी जीवनी में खुद को कश्मीरी पंडित साबित करने के लिए नाना प्रकार के अनर्गल प्रलाप किये है जो की महत्वहीन और असम्बद्ध भी है, परन्तु उन्होंने कहीं भी कश्मीर के उस भू-भाग का जिक्र नही किया है जहाँ के वे खुद को खानदानी बताते है. परन्तु विडम्बना देखिये, खुद को कश्मीर पंडित साबित करने के लिए अनर्गल प्रलाप करनेवाला नेहरु की राय कश्मीरी पंडितों के सम्बन्ध में कितना घिनौना और निम्नस्तरीय है. नेहरु ने अपनी पुस्तक Glimses of World history में लिखा है:
“The treatment of men was sometimes worse than that of animals (some of the animals like cows were actually revered because they were Gods).

Lower caste Hindus had a miserable life. Other historians have commented that the treatment of women was even worse, specially women of lower castes, they were considered the property of the upper caste Hindus, to be molested and/or raped at will.

In many cases the new bride had to stay a night with the village Brahman before she was married off. Kashmir converted to Islam during this time period. It was cruelty like this that led to the whole sale conversion to Islam. The new religion offered them equality and saved them from the Brahmans.”

जरा तीसरे पैरा पर ध्यान दीजिए. नेहरु का मानना है की कश्मीर की सामाजिक धार्मिक स्थिति बहुत ही खराब थी और वे ब्राह्मणों के अत्याचार से त्रस्त थे. और इन्ही अत्याचार के परिस्थितियों में कश्मीर के लोगों ने सामूहिक रूप से इस्लाम धर्म कबूल कर लिया. कश्मीर के इतिहास लेखक कल्हण, विल्हण या अन्य किसी ने भी इसप्रकार की बातें नही लिखी है. दूसरी बात कश्मीर १४ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से ही मुस्लिम अत्याचार से त्रस्त था. (मैं कश्मीर के इतिहास पर जाना नही चाहता हूँ, पर मैं बता दूँ की नेहरु को भारतीय इतिहास की वास्तविक जानकारी बिलकुल नही थी.) शायद नेहरु को यह पता नही था की सिकन्दर शाह जैसे मुस्लिम शासकों ने कश्मीरी पंडितों के लिए तीन ही विकल्प दिए थे-इस्लाम कबूल करो, घाटी छोड़ो या मरो और उसने लाखों की संख्या में ब्राह्मणों का कत्ल करवाया था और यह की १८४६ में जब कश्मीर के महाराज गुलाब सिंह हुए तो १८४८ में हजारों की संख्या में धर्मान्तरित मुस्लिम उनके दरबार में उपस्थित हुए थे और अपने उपर मुस्लिम अत्याचार और जबरन धर्मान्तरण का हवाला देकर वापस हिंदू धर्म में शामिल करने की प्रार्थना की थी. गुलाब सिंह इसके लिए आश्वाशन भी दिए थे पर उनके पुरोहित की धर्मान्धता के कारण यह शुभ कार्य पूरा नही हो सका (My Frozen Turbulence of Kashmir- by Jagmohan).
यह उस कश्मीरी पंडित का विचार है जो खुद को कश्मीरी कहते नही अघाता है और खुद को कश्मीरी पंडित साबित करने के लिए मरता दिखाई देता है. कोई भी कश्मीरी पंडित इस प्रकार की सोच नही रख सकता है. इससे स्पष्ट होता है की नेहरु पंडित तो क्या हिंदू भी नही थे बल्कि कट्टर मुस्लिम थे. और यह उनके अगले वाक्य से स्पष्ट होता है की ‘नए धर्म ने उन्हें समानता का अवसर दिया और उन्हें ब्राह्मणों से बचाया.’ सवाल है यदि इस्लाम उसे इतना ही महान जान पडता था तो वे फिर खुद को कश्मीरी पंडित साबित करने के लिए क्यों मरे जा रहे थे? वे मुसलमान क्यों नही हो गये? और यदि कश्मीरी पंडितों का कश्मीर में उतना ही धाक था तो वो छोड़कर मुगलों के तलुवे चाटने क्यों आ गए थे?
उपर्युक्त से स्पष्ट है की नेहरु के लिए हिंदुओं और हिंदू धर्म के लिए वैसे ही घृणा थी जैसे एक कट्टर मुस्लिम में होता था और उसके नजर में दार-उल-इस्लाम और इस्लाम में धर्मान्तरण ही हिंदुओं के अत्याचार से मुक्ति का मार्ग था. कश्मीर दार-उल-इस्लाम के मार्ग पर अग्रसर था जबकि हिंदू धर्म की मजबूत जड़ें शेष भारत में इस मार्ग की बाधाएं थी और जिसके कारण उन्हें भारत के टुकड़े होने का खतरा दिखाई पडता था.
६. नेहरु के उपर्युक्त निष्कर्ष कांग्रेस-वामपंथी इतिहास लेखकों की प्रेरणा स्रोत बन गयी है और ये भडूवे इतिहासकार अपने आका को खुश करने के लिए हर जगह हिंदुओं और हिंदू संस्कृति को बदनाम करने के लिए ऐसे ही निष्कर्षों का सहारा लेते है. वास्तविकता यह है की ये बुराइयां मध्यकालीन मुस्लिम अत्याचार और भोगवाद को व्यक्त करती है जो कालांतर में उन्ही से प्रेरित होकर कुछ हिंदू रजवाड़े और जमींदार तक पहुच गए थे.
७. किसी भी सभ्यता संकृति और धर्म को नष्ट करना हो तो सबसे पहले वहाँ की शिक्षा व्यवस्था को विकृत कर देना चाहिए ये नेहरु ने अंग्रेजों से अच्छी तरह सीख लिया था. प्रधानमंत्री बनने के बाद उसने अबुल कलाम आजाद को शिक्षा मंत्री बनाकर अपने इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु लगा दिया. इसमें हिंदुओं के गौरवशाली इतिहास को विकृत और घृणित रूप में पेश किया गया और आक्रमणकारी मुस्लिमों का महिमा मंडन किया गया जिसे पढकर लोगों में हीन भावना उत्पन्न होती है और यही उसका उद्देश्य भी था. विश्व में एकमात्र भारत ऐसा देश है जहाँ की इतिहास में आक्रमणकारियों को हीरो और अपने देश, अपनी सभ्यता और संस्कृति, धर्म और मर्यादा की रक्षा हेतू लड़नेवाले वीरों को विलेन के रूप में पेश किया गया है. कांग्रेस-वामपंथी इतिहासकार हमे यह पढ़ने और मानने के लिए विवश करते है की मुस्लिमों के भारत आने के पहले भारत की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, प्रशासनिक स्थिति बहुत ही खराब थी और उसमे व्यापक सुधार और विकास मुस्लिमों के आगमन पश्चात ही हुआ है जबकि सच्चाई ठीक इसके विपरीत है. इन बातों से भी स्पष्ट है की नेहरु वास्तव में मुसलमान थे.
८. जिन्ना और मुस्लिम लीग ने जब हिंदुओं के विरुद्ध प्रत्यक्ष कार्यवाही की घोषण की और हिंदुओं की हत्या, लूट और हिंदू स्त्रियों के बलात्कार होने लगे उस समय नेहरु भारत के अंतरिम प्रधानमंत्री थे, पर उन्होंने इसे रोकने का कोई प्रयत्न नही किया, परन्तु बिहार में जैसे ही कोलकाता में मारे गए लोगों के परिजनों ने इसके विरोध में प्रतिक्रिया व्यक्त की इन्होने तत्काल सेना भेजकर उन्हें गोलियों से भुनवा दिया.
९. शेख अब्दुल्ला १९३१ से ही घाटी में उत्पात मचा रहा था, महाराजा हरिसिंह के विरुद्ध आन्दोलन चला रहा था और हिंदुओं का खुले आम कत्ल और लूटमार कर रहा था, पर जब महाराजा ने शेखअब्दुल्ला को नजरबंद कर शांति स्थापना का प्रयास किया तो नेहरु शेख अब्दुल्ला के समर्थन में कश्मीर में दंगे फ़ैलाने पहुँच गए. नेहरु ने शेख अब्दुल्ला को शेर-ए-कश्मीर एवं लोगो का प्रिय हीरो बताते हुए अपने भाषण में कहा, “यह बड़े दुःख की बात है की कश्मीर प्रशासन अपने ही आदमियों का खून बहां रही है. मैं कहूँगा की उसका यह कृत्य प्रशासन को कलंकित कर रही है और अब यह ज्यादा दिन तक नही टिक सकती. मै कहता हू की कश्मीर की जनता को अब और अपनी आजादी पर हमला एक पल भी बर्दाश्त नही करना चाहिए. यदि हम अपने शासक पर काबू पाना चाहते है तो हमे पूरी शक्ति के साथ उसका विरोध करना चाहिए. (Sardar Patel’s Correspondence- by Durga Sinh)
ज्ञातव्य है की एक तरफ हरिसिंह जब अपने अल्पसंख्यक हिंदुओं, बौधों और सिक्खों को बचाने का प्रयास कर रहे थे उसी समय हैदराबाद में निजाम हिंदुओं पर भयानक अत्याचार कर रहे थे ताकि हैदराबाद से हिंदू पलायन कर जाये और हैदराबाद मुस्लिम बहुल हो जाये ताकि वह भारत में विलय करने को बाध्य न हो, पर नेहरु ने उस क्रूर निजाम को कुछ भी नही कहा जबकि हरिसिंह के पीछे पडकर शेख अब्दुल को गद्दी पर बिठाकर उन्हें राज्य से भी बाहर कर दिया. ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि वे न केवल संस्कार से मुस्लिम थे बल्कि विचार से भी मुस्लिम ही थे और हम सहमत है की उनका हिंदू होना महज एक दुर्घटना मात्र था.
१०. जब महाराज हरिसिंह ने जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में कर दिया तो नेहरु ने उसे अस्थायी घोषित कर प्लेबीसाईट के माध्यम से अंतिम निर्णय की घोषणा की. जम्मू-कश्मीर के सर्वेक्षण करनेवाले शिवन लाल सक्सेना ने अपने रिपोर्ट में बताया की ‘७८% मुस्लिम आबादी वाला जम्मू-कश्मीर में प्लेबीसाईट का परिणाम भारत के पक्ष में होने की उम्मीद करना महा पागलपन है’. पर नेहरु ने उनकी बातों पर ध्यान नही दिया. इतना ही नही शेख अब्दुल्ला के साथ मिलकर गुपचुप धारा ३७० तैयार कर लिया और संसद में दबाव डालकर पास भी करवा लिया जो आजतक भारत की गले की हड्डी बनी हुई है. कश्मीरी आतंकवाद और भारत में मुस्लिम आतंकवाद की जड़ नेहरु की यही तुष्टिकरण नीति थी. (कश्मीर समस्या पर विशेष जानकारी के लिए मेरा लेख “अखंडता पर सवाल: धारा ३७०” पढ़ें)
११. जब हमारी सेना जीत के करीब पहुँच गयी थी तब इन्होने अकारण एक तरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी जिसके कारण आज भी जम्मू-कश्मीर का बहुत बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के पास है.
१२. जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया और हमारी सेना उससे लोहा ले रही थी उस समय पाकिस्तान को ५५ करोड़ रूपया देने में गाँधी के साथ इनका भी हाथ था.
१३. नेहरु को राष्ट्रवाद से घृणा था. वह उसे ‘बू’ कहते थे (भारत गाँधी नेहरु की छाया में- लेखक गुरु दत्त) पर वास्तविकता यह थी की उसकी नजर में राष्ट्रवाद का मतलब हिंदू राष्ट्रवाद से था और वे तो हिंदुओं से घृणा करते थे. हिंदू और हिंदुत्व की बात करनेवाले उनके नजर में देशद्रोही था (भारत गाँधी नेहरु की छाया में).
१४. जब धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ तो कायदे से इस्लाम के सभी अनुयायी को पाकिस्तान और बंगलादेश में चले जाना चाहिए था और हिन्द सभ्यता और संस्कृति के समर्थक को भारत आ जाना चाहिए था परन्तु गाँधी और नेहरु के कारण यह नही हो सका जिसका परिणाम यह हुआ है की नेहरु गाँधी के छलावे में फंसकर बंगलादेश और पाकिस्तान में रह जानेवाले लाखों करोड़ों गैर मुस्लिम आज महज कुछ हजारों में सिमट गए है और मौत से भी बत्तर जिंदगी जीने को बाध्य है. वे आज भी लूट, हिंसा, बलात्कार और धर्मान्तरण के शिकार हो रहे है और अपना अस्तित्व बचाने के लिए भारत से शरण की मांग कर रहे है. इतना ही नही हिंदुस्तान के हिंदुओं के सीने पर आज भी मुसलमान मुंग दल रहे है तथा कट्टरवादी मुस्लिमों और नेहरु गाँधी के उपज छद्मधर्मनिरपेक्षवादी राजनेताओं के षड्यंत्र से हिंदुस्तान की अखंडता एकबार फिर संकट में पड़ती जान पर रही है.
१५. नेहरु खुद को नास्तिक कहते थे. पर वास्तविकता यह है की वे राजनितिक कारणों से खुद को मुस्लिम या इस्लाम समर्थक नही कह पाते थे और इसीलिए वे नास्तिकता का चोला ओढ़े रहते थे और इस नास्तिकता की आड़ में हिंदुओं और हिंदू धर्म के विरुद्ध अपने मुस्लिम संस्कार, विचार और कार्यों को संरक्षण दे रहे थे.
१६. नेहरु ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण को संगठित रूप दिया जिसका दुष्परिणाम पूरा देश भुगत रहा है.
१७. नेहरु खुद तो यह स्वीकार करते ही थे की उनके संस्कार मुस्लिम के है, उपर्युक्त तथ्यों और उनके कार्यों के आधार पर मेरा मानना है की वे अपने विचार और कार्य से भी मुस्लिम ही थे. उनके साथ जुड़ा हिंदू शब्द उनके लिए कष्टकारी था जिसकी अभिव्यक्ति वे यदा कदा और हिंदू होने को महज एक दुर्घटना कहकर व्यक्त करते थे. उनका नास्तिक होना ठीक वैसे ही था जैसे आज रोमन कैथोलिक ईसाई सोनिया और उसकी संताने जनता को धोखा देने के लिए हर जगह अपना धर्म ‘Religious Humanity’ लिखते है.
भाग-३
इंदिरा गाँधी के जीवन और कार्य भी इस ओर संकेत करता है की नेहरु मुस्लिम थे:
• मैमून बेगम उर्फ इंदिरा गाँधी फिरोज खान वल्द जहाँगीर नवाब खान से निकाह की थी.
• मैमून बेगम उर्फ इंदिरा गाँधी के दोनों पुत्र राजीव खान गाँधी और संजय खान गाँधी के पिता मुस्लिम ही थे.
• इंटरनेट से प्राप्त जानकारी के अनुसार इनके दोनों पुत्रों का आवश्यक मुस्लिम संस्कार भी हुआ था.
• फिरोज खान का मकबरा इस बात का प्रमाण है की इंदिरा गाँधी अपने मुस्लिम संस्कारों को नही त्यागी थी.
• १९७१ की लड़ाई में ९२ हजार से उपर पाकिस्तानी सैनिक बंदी बनाये गए थे जिसे इंदिरा गाँधी ने बिना शर्त छोड़ दिया. वे चाहते तो इसके बदले पाक अधिकृत कश्मीर का सौदा कर सकती थी. कुछ नही तो बदले में पाकिस्तान द्वारा बंदी बनाये गए भारतीय सैनिकों को तो रिहा करवा ही सकती थी पर उन्होंने ऐसा कुछ नही किया.
• जनसंख्या नियंत्रण की नीति के तहत इनके द्वारा चलाये गए नशबंदी अभियान के बारे में तत्कालीन इतिहासकार लिखते है, “हिंदुओं को उनके घरों, दुकानों यहाँ तक की मंदिरों से भी खिंच खिंच कर नशबंदी किया जाने लगा, परन्तु इस सरकार की कभी हिम्मत नही हुई की वे एक मस्जिद से किसी मुसलमान को खिंच ले या एक ईसाई को किसी गिरजाघर से खिंच लें.” इस घटना का जिक्र होने पर बचपन में मेरी बुआ बताई थी की इंदिरा गाँधी हिंदू और मुसलमान की जनसंख्या बराबर करना चाहती थी.
• इंदिरा गाँधी अफगानिस्तान बाबर के मजार पर सिजदा करने गयी थी
• अरब के प्रिंस ने इंदिरा गाँधी को मक्का आने का निमंत्रण दिया था जहाँ गैर मुस्लिमों को जाना वर्जित है.
• इंदिरा कहती थी मैं हिंदू से विवाह नहीं करुँगी. मुझे हिंदुओं से बेहद घृणा है: ओ एम् मुथैया
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