नई दिल्ली, अक्टूबर 31: देश में तथाकथित तौर पर बढ़ रहे ‘असहिष्णुता’ के माहौल का हवाला देकर एक के बाद एक सरकार का विरोध करते हुए अपने पुरस्कारों को लौटाने वाले लेखकों, कवियों व फ़िल्मकारों के प्रतिउत्तर में शुक्रवार को राजधानी दिल्ली में बड़े पैमाने पर सिख समुदाय के लोग जमा हुए और प्रदर्शन किया।

लेखकों के प्रदर्शन का मकसद था उन गणमान्य लेखकों से सवाल करना कि आखिर क्यों आज ही की तरह ‘असहिष्णुता’ को कारण बताकर 1984 में हुए सिख दंगों का विरोध उनके द्वारा नहीं किया गया। बढ़ते अराजकता एवं भय को बिगड़ती हालत का कारण बताने वाले लेखकों के उस चुप्पी का विरोध सिखों ने किया जो 1984 के दंगों के बाद देखी गयी।

जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों की अगुआई करने वाले लेखक गुरचरण सिंह बब्बर ने 1984 के भीषण दंगों पर अपने द्वारा लिखी गयी किताब ‘सरकारी कत्लेआम’ की 500 प्रतियों को लोगों के साथ मिलकर विरोध स्वरूप जलाया और पूछा कि आखिर पिछले 31 सालों से इस संदर्भ में लंबित केसों का निपटारा कर इंसाफ को क्यों नही किया गया।

बब्बर ने मीडिया से कहा, “हम लेखक व उपन्यासकारों की बिरादरी से पूछना चाहते हैं कि आज ‘असहिष्णुता’ का हवाला देने वाले लोग उस वक़्त कहाँ थे जब 1984 में बड़े पैमाने पर सिखों के विरुद्ध दंगे करवाए गए और आज तक उसका न्याओचित इंसाफ नहीं हुआ; क्यों नहीं आज की तरह विरोध प्रदर्शन इतने सालों में देखने मिला??

84′ की दुखद घटनाओं का संक्षिप्त विवरण देने वाली बब्बर की किताब हिन्दी, अँग्रेजी, पंजाबी व उर्दू में उपलब्ध हैं। गौरतलब है कि 1989 में सुरेश चौहान नामक शख्स ने कोर्ट जाकर इस किताब पर यह दलील देकर रोक लगवाई थी कि इस किताब में कहे गए बातों से न्यायाधिकरण का अपमान हो रहा है, अधिकतर लोगों की भावनाएं आहत हो रही हैं तथा फिर से दंगे हो सकते हैं। हालांकि बाद में इस किताब से रोक हटा ली गयी।

बब्बर ने आगे कहा कि 1984 से लेकर आज तक दंगे की जांच हेतु कई सारी समितियां बनी, वायदे किए गए, यहाँ तक कि दोषियों को क्लीन चिट भी दिये गए पर इंसाफ के मामले में कुछ ठोस नहीं हुआ और सिर्फ ड्रामा हुआ। क्यों नहीं तब इन लेखकों ने आवाजें उठाईं।

गौरतलब है कि, जिस तरह से पूरी आजादी से सरकार का विरोध कर खराब माहौल का आरोप उन पर मढ़ते हुए अपने अपने पुरस्कार लोग वापस कर रहे हैं और फिर भी यह दुहाई दे रहे हैं कि समाज में उनकी बातें नहीं सुनी जा रही, एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो इनके कार्रवाई को ‘ढोंग’ कह रहे हैं और इसे अतिशयोक्ति करार देते हुए दोहरे मापदंड पर प्रश्न उठा रहे हैं। यह जनता के विवेक व सोच पर निर्भर करता है कि वे खुद सोचें कि कितनी हद तक उनके आवाज़ों को वाकई में दबाया गया है या फिर महज एक विचार का विरोध करने के चक्कर में पूरी सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। बहस होने की आवश्यकता है क्योंकि आज के मीडिया के युग में छपी हुई रपटों से दुनियाभर में भारत की छवि के धूमिल होने का खतरा भी है। बाहरी लोगों को क्या पता, वे तो उसे ही सच मानेंगे जो उन्हें समाचार के रूप में परोसा जाता है।

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