मोदी जी के ” नोट्बंदी ” से कुछ बड़े काले कपडे ओढ़े हुए कुछ भेड़ो की पूँछ भी दब गई है | डेट पर डेट पड़ती जाती है पर सुनवाई कभी नही हो पाती मुकदमों मे, लेकिन नोट की समस्या इन्हे जल्दी समझ आ गयी . या आप इसे यू भी समझ सकते है की हमारे न्यायाधीशो को कानून से ज्यादा नोटों की भाषा समझ आती है | मुकदमो की लाइन पहले देखिए जो आप ही को देखना है मोदी जी को नही .
मी लॉर्ड की बात लोग समझ नहीं पाए , “दंगे हो सकते हैं”… ये कोई चेतावनी नहीं थी , ये तो “हिंट” थी की दंगे करवाओ तभी जाकर हम हस्तक्षेप कर पाएंगे…. वर्ना सब लुट जाएगा … और तुम्हारा तो ठीक है … हम न्यायमूर्तियों के घरों में जमा हुआ “न्याय” भी सब रद्दी हो जायेगा !!
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