क्या सच में पूरा भारतवर्ष कभी गुलाम था ? एक बार पढ़ियेगा ज़रूर क्यूँकि सच्चाई कुछ और है !!
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हम facebook एवं ब्लॉगर like पाने के लिये कुछ भी डाल देते थे परन्तु यह भूल जाते थे इससे हमारे स्वाभिमान एवं धर्म के लिए राष्ट्र के लिए बलिदान हुए वीरो की बलिदानी को भी झूठला रहे हैं।
और रही बात हिन्दू नारियों पर अत्याचार की हाँ किये होंगे पर इतने नहीं जितना बताया जाता हैं like पाने के लिए लाखो लाख से उप्पर हिन्दू नारियो को बेचा गया यह नहीं मान सकती और इतिहास तथ्यानुसंधन करते करते आक्रमणकारियों के १००० साल के आक्रमण में १००,००० से उप्पर नहीं गया आकड़ा मुग़ल केवल दिल्ली तक था कई हिन्दू राजाओ के स्वतंत्र राज्य थे एवं जो राजा आक्रमणकारियों के अधीन दिल्ली तख़्त के वफादारी में कार्य करते थे उनके राज्य संधियों के अनुसार स्वतंत्र होते थे केवल राजकोष पर आधा अधिकार दिल्ली तख़्त पर बैठनेवाले सुल्तान का भी होता था । और दूसरी बात क्या हमारे हिन्दू राजा इतने कायर थे की वह हिन्दू नारियों का सीलभंग करते थे और हिन्दू राजा ताली बजाते थे ऐसा भी नहीं था इतिहास गवाह भारत की भूमि का ऐसा कोई कोना नहीं होगा जहा मलेच्छों के साथ युद्ध में लहूँ न बहाया हो फिर ऐसी अफवाह फैलाकर क्या हम उनके बलिदानियो के साथ न्याय कर रहे हैं ??????
मित्रो मैं इतिहास का अभ्यास करना आज से नहीं तीन साल पहले से करना शुरू की थी विश्वास नहीं आता हैं की 22,000 हिन्दू योद्धाओ की लिपि को गायब करवा चुके थे मैक्स-मुल्लर ने सन १८८३ ने भारत से 11,000 ऐतिहासिक लिपि , वैदिक लिपि को भारत से ब्रिटेन भेज दिया और ऐसी हजारो हज़ार लिपि एवं किताबो को ग्रंथो को प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद ने गुम करवा दिया था ।
सन १२५३विक्रम संवत में भरतपाल चंदवार में शासन कर रहा था चंदवाड़ राज्य की स्थापना करने वाले चंद चौहान के वंशज थे और इसी चन्द चौहान का वंशज भरतु (भरतपाल ) थे । राजा भरत का राज्य उत्तर भारत से लेकर पूर्वी बंगाल कामरूप तक फैला हुआ था। राजा भरत ने अवध के शहजादा नसीरुद्दीन के साथ उनके १,२०,००० सिपाहियो को परास्त कर अवध पर हिन्दू राज स्थापित किया।
अनुव्रतारत्नाप्रदिपा लिपि में भरतपाल को भारतवर्ष का सबसे बड़ा रक्षक के रूप में वर्णित किया गया हैं , भरतपाल के उपलब्धियों को इतिहासकारों ने अनदेखा कर दिया था कई सारे इतिहासकारों ने भारतपल चौहान के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए थे पान्तु कई सारे लिपि जैसे हर्षा लिपि , अनुव्रतारत्नाप्रदिपा लिपि , कवि लक्षमण ने वि.सं.१३१३ में अण बयरयणपईव की रचना में राजा भरतपाल का उल्लेख मिलता हैं मिन्हाज द्वारा लिखा गया तबाक़त – ई – नसीरी में लिखा गया हैं शहजादा नसीरुद्दीन को जब अवध का राजपाठ संभालने के लिए भेजा तब सन १२२६ ईस्वी के में राजा भरत ने १ लाख २०हज़ार मुसलमान आक्रान्ताओं को महाकाल के चरणों में बलि चढ़ा दिया गया इस हादसे से सुलतान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश बौखला गया और कसम खाया की राजा भारत को मौत के घाट उतार कर ही दिल्ली के गद्दी पर बैठेगा (Page No.-: 23 Dasharath Sharma Early Chauhan Dynasty) में भी लिखा गया था ।
शम्सुद्दीन इल्तुतमिश ने राजा भरत के राज्य चंदवार पर आक्रमण किया परन्तु राजा भरत के साथ हुए युद्ध में दो बार पराजय का सामना करना पड़ा था शम्सुद्दीन इल्तुतमिश युद्ध के मैदान छोड़ कर भागने पर मजबूर होगया था पर राजा भरत ने धर्मयुद्ध के नियमो का पालन करते हुए भागते हुए राजा एवं सैनिको के पीछे वार करना उचित नहीं समझा और जाने दिया ।
शम्सुद्दीन ने परिस्थिति को समझते हुए राजा भरत के ताकत को समझते हुए संधि करना ठीक समझा और राजा भरत के राज्य को स्वतन्त्र राज्य घोषित कर दिया ।
राजा भरत के बाद राजा जाहड़ एवं राजा बल्लाल दो पीढ़ी बाद आह्वमल्ल चौहान राजा बने सन १५२६ ईस्वी में इन्होने रणनीति , राजनीती , कूटनीति हर प्रयास किये थे चंदवार के साथ साथ बाकी सारे राज्य को स्वतंत्र राज्य रखने का परन्तु हर प्रयास को तुर्क मजहबी आक्रांताओं ने विफल कर दिया था ।
जब कोई रास्ता नहीं बचा तब धर्म की रक्षा के लिए क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुए युद्ध लड़ा गया जिसमे उन्होंने वीरता और शौर्य का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया था हम्मीरा महाकाव्य में वीर हम्मीरा की उपाधि से समान्नित किया गया हैं कारण यह था आह्वमल्ल ने लगातार १५ वर्ष तक अपने राज्य को मलेच्छ मुस्लिम शासको से अपने राज्य की एवं प्रजाओ की रक्षा करते हुए एक योद्धा एवं राजा दोनों की भूमिका में कोई कमी ना रखते हुए अच्छी तरह धर्म एवं हिन्दू स्वतंत्र राज्य की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए हम्मीरा महाकाव्य में महावीरो के भी वीर की उपाधि प्राप्त किया ।
जब सन (१२६०) के बीच सुल्तान नसीरुद्दीन के विरुद्ध युद्ध किया और भारतवर्ष की स्वतंत्रता के लिए युद्ध किया तब अनिर्णायक युद्ध सिद्ध हुआ क्योंकि सुल्तान नसीरुद्दीन की सेना की संख्या राजा आह्वमल्ल से अधिक होते हुए भी दिल्ली हाथ से निकलने की परिस्थिति आगया था नसीरुद्दीन घायल होकर युद्ध को रोकने के लिए प्रार्थना पत्र भेजा सेनापति इजामुद्दीन के हाथो हिन्दू राजा आह्वमल्ल ने मलेच्छों के साथ इंसानियत दिखा कर भूल किया और कुछ दिनों के लिए युद्ध को रोकने के लिए कह दिया आह्वमल्ल ने अपने सेना से युद्ध विराम घोषणा करते ही नसीरुद्दीन ने भेड़ियों की तरह चुपके लाहौर से सेना बुलाया और लाहौर भी ममलूक वंश के कब्जे में लिए गए राज्य में आता था और वहा से सेना की सहायता मिलते ही नसीरुद्दीन ने मध्यरात्रि के समय कायरता की पराकाष्ठा दिखाते हुए राजा आह्वमल्ल के सोते हुए सिपाहियों के शिविर में हमला कर दिया राजपूत वीरो ने जल्द ही संभलते हुए नसीरुद्दीन के मल्लेच्छ सैनिको को काटना आरंभ कर दिया पर नसीरुद्दीन का ख्वाब अधुरा रहा राजा आह्वमल्ल को जीवित पकड़कर चंदवार राज्य में जुलुस निकाल कर हिन्दुओं के मस्तक झुकाने का ख्वाब ख्वाब ही रह गया राजा आह्वमल्ल ने परिस्थिति समझते हुए
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