Archive for માર્ચ, 2017


હસ્ત રેખાઓ

હસ્ત રેખાઓ
=========
બંધ મુઠ્હીમાં રહયા વર્તારા છે મન અમારે
જીવન હસ્ત રેખામાં સમાયું સફર દરબારે
બંધ મુઠ્હીના વર્તારા વદે વાણી સત્ય જાણે
અંધારામાં સુખ દુખ ની ખબરો શકે ઘરબારે
ગભરામણ ડર ભય બંધ મુઠીમાં છુપા બોલે
બહાદૂરી સજાવે જે પાસા ખોલી જીત અપાવે
બંધ મુઠી છે બુદ્ધિ આબરૂનો જ્ઞાન ખજાનો
ખુલ્લી માન વગરનું મ્હેણું સંસારની સખાવતે
ઝાંઝવા સુકા ઝંગલે ફળે તરસતી ન તલપનો
રેખાનો દરિયો નાવ ઉગારે મઝધારથી કિનારે
શું આ શળ હશે બંધ ભાવિ જન્મથી મારણના
કે પછી રાખી છુપી લગામ આ ભવની કિરતારે
===પ્રહેલાદભાઈ પ્રજાપતિ
રિવાઇઝ ઓન 29 /3 /2017

धारा 370 पर स्वामी ने जमकर धोया रामजेठमलानी को

 

सुब्रमण्यम स्वामी और रामजेठमलानी दोनों ही देश के सर्वश्रेष्ठ क़ानूनविदों में शुमार किये जाते हैं.परन्तु धारा 370 पर दोनों की राय काफी अलग-अलग हैं.जहाँ स्वामी जी धारा 370 को भारत की संप्रभुता और संविधान की मूल भावना अर्थात ‘समानता के अधिकार’ का विरोधी बताते हैं वहीं रामजेठमलानी जैसे वकील इसे खारिज कर देते हैं.वीडियों में स्वामी जी ने रामजेठमलानी के कुतर्कों पर जोरदार टिप्पणी करते हुए धारा 370 की पूरी पोल खोली है.

स्वतन्त्रता के पश्चात से ही संविधान में अस्थाई और संक्रमणकालीन उपबंध के तौर पर जोड़ी गयी धारा-370 की प्रासंगिकता शुरू से ही ज्वलंत मुद्दा रही है.जानकर मानते हैं की धारा-370 कश्मीर को शेष भारत से अलग बनाती है.

पंडित नेहरू की सबसे बड़ी नाकामियों में शुमार धारा 370 के कारण आज कश्मीर अलगाववाद और संप्रदायवाद का अड्डा बन गया है.वहाँ के मूल रहवासी कश्मीरी पंडित धार्मिक अतिवाद के कारण अपने ही देश में ‘रिफ्यूजी’ की तरह रह रहे हैं.

પાણી નાં પગરખાં
===========
ધમ ધોકાર દોડી વરસી રહ્યાં પાણીનાં પગરખાં
શુ ? આ સાતેય દરિયાનાં મૂળ હસે અવકાશમાં ?
સૌ જળ સમૂહોનાં મૂળ  જળ રહ્યાં હશે આકાસમાં
નહીતર ચોમાસે વરસાદ મંડરાય નહિ અવકાશમાં
વાદળ ફાટ્યાના કીસ્સાય ઘણા બન્યા છે ધારા પર
પાણીથી મોતના કીસ્સાય ઘણા છે ભૂમિ ભૂગોળમાં
દરિયા ધરા પરના શરમાયાય ઘણીવાર વરષાથી
બારે મેઘ ખાંગા થઈ તાંડવ કર્યાંય છે અવકાશથી
વરસી ધરાપર આકાશી દરિયાઓ વશ્યા આકાશમાં
રહ્યાં પાથરતાં લીલી ચાદરો સમ મેદાનો ભૂમિ ભાગમાં
પગરખાં પાણીનાં પડી  રહ્યાં જંગલે ધરા ની ધારમાં
ધન્ય ધરાપર કુદરતી અભયદાનો ભૂમિના કિરદારમાં
ગુરતવા કર્ષણ કે સાયન્સ ના સિદ્ધાંત ની શરણાગતિ ?
કવિ રવિ કે અનુભવી ની મર્યાદા પારની કથા દીદારમાં
===પ્રહેલાદભાઈ પ્રજાપતિ
રિવાઇઝ  ઓન 28 /3 /2017
काबा में आज भी चलता है वेदो का कानून
=====================
आप देशवासियों के लिये अपना पूरा जीवन लगा देने वाले भाई राजीव दीक्षित जी #Youtube Channel से जुड़े ! Subscribe Now
लेखिका: फरहाना ताज
काबा जो बैलुल्लाह यानी अल्लाह का घर माना जाता है, उसका अति प्राचीन नाम मक्ख-मेदिनी है और मक्ख-मेदिनी का मतलब होता है यज्ञभूमि। मक्का का काबा मंदिर वास्तव में काव्य शुक्र का मंदिर है। काबा काव्य का ही अपभ्रंश है। शुक्र का अर्थ जुम्मा अर्थात् बड़ा होता है और गुरु शुक्राचार्य बड़े ही माने जाते हैं।
यज्ञ करने वाला अपनी सांसारिक इच्छाओ और वासनाओ को छोड देता है और यज्ञ में पाक एवं बिना सिले सफेद वस्त्र पहनने की परम्परा वैदिक काल में रही है और यही सब हज के दौरान भी होता है, हाजी एहराम पहनते हैं यानी दो बिना सिले सफेद कपडे के टुकडे होते हैं।
यज्ञ हिंसा से रहित होता है और हज भी हिंसा से रहित होती है। मक्का का पाक क्षेत्र पूरी तरह सम्मानित है, ये लोग वेदो को तो भूल गए, लेकिन यहां पर फिर भी अल्लाह की सबसे पहली किताब वेदो के ही कानून का पूरी तरह पालन किया जाता है, वेद में किसी भी प्रकार की हिंसा या बलि का विधान नहीं और मक्का में यही वेदो का कानून आज भी चलता है, इस पाक क्षेत्र में कोई भी हाजी किसी भी जानवर, यहां तक की मक्खी और इससे भी आगे बढकर किसी प्रकृति यानी किसी पौधे को तनिक भी हानि नहीं पहुंचा जा सकते। हज यात्री का पूरा अस्तित्व अल्लाह को समर्पित हो जाता है। यदि अल्लाह को कुर्बानी पंसद होती तो काबा जो बैलुल्लाह यानी अल्लाह का घर माना जाता है, फिर यहां पर सबसे अधिक बकरे काटने के लिए हाजी साथ लेकर जाते? लेकिन यह क्षेत्र तो हिंसा से रहित है, क्योंकि यहां वेदो का कानून चलता है। पांच वक्त की नमाज का बहुत महत्व है। नमाज खुद संस्कृत का शब्द है यानी पंच और यज्ञ। और पांच का महत्व वेदो में ही है, जैसे पंचाग्नि, पंचपात्र, पंचगव्य, पंचांग आदि।
पांच दिन के हज के दौरान पूरी दुनिया के हाजी मक्का में एकत्र होते हैं और एक साथ इबादत करते हैं और एक साथ लगातार एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते रहते हैं। हज शब्द ही संस्कृत के व्रज का अपभंश है, वज्र का अर्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना है।
सफेद वस्त्रधारी हाजी काबा की सात परिक्रमाएं करते हैं, सात परिक्रमा का विधान पूरी तरह वेदो का है। सप्तपदी मंदिरो में होती है, सप्तपदी विवाह संस्कार में होती है यज्ञ के सामने। John Lewis Burckhardt लिखते हैं कि मुसलमानों में हज की यात्रा इस्लाम पूर्व की है। उसी प्रकार Suzafa और Merana भी इस्लाम पूर्व के पाक क्षेत्र हं और क्योंकि यहा Motem और Nabyk नाम के देवताओ के बुत होते थे। अराफात की यात्रा कर लेने पर यात्री प्रकार Motem और Nabyk की यात्रा करते हैं। N. J. Dawood ने कुरान के अंग्रेजी संस्करण की भूमिका में लिखा है कि कुरान का प्रत्येक शब्द स्वर्ग में लिखे हुए शिलालेख से अल्लाह ने देवूदत ग्रेबियल द्वारा मोहम्मद को जैसा सुनाया, वैसा लिखा गया। बाइबिल कहती है और स्वर्ग में ईश्वर का मंदिर खोला और उसके नियम का संदूक उसके मंदिर में दिखाई दिया। ईश्वर का ज्ञान चार संदूको में है। अब सच यह है कि सृष्टि के आरम्भ में ही अल्लाह ने चार मौलाओ यानी ऋषियों को अपना ज्ञान दिया, इसलिए अल्लाह का कानून वेद हैं। वेदो में ज्ञान और विज्ञान है, लेकिन कुरान में ज्ञान-विज्ञान की बाते कम और इतिहास अधिक है। लेकिन इतिहास लिखने का कार्य अल्लाह का नहीं हो सकता, इतिहासकारो का होता है। अल्लाह तो ज्ञान और विज्ञान की बाते ही बता सकते हैं।
यहां चित्र में देख लीजिए इन हाजियो के परिधान यज्ञकर्ताओ जैसे क्यों हैं?

પ્રજાના માંનામો ઉઠતા સવાલો ?
===================
ચોર , ગુંડા, લુંટેરા,ડકૈત ,બળાત્કારીઓ અસામ્જીક તત્વો મંદિરે જવાથી શું પવિત્ર બની જાય છે ?
શું તેમના પર કોઈ જાતનું દીશારોપણ નકરી શકાય ?
અને માંન્દીર્મો જવાથી મંદિરનું અપમાન કે અપવિત્ર થાય છે ?
કેટલી સ્વાર્થી અને લૂલી બચાવ ગીરી ?
પ્રજાની ઓખમો ધૂળ નાખવાની કદાકીય કેટલી બલાજ્બરાઈ ?
સત્યને શું સત્ય ન કહી શકાય ?

लाख दवाओं की एक दवा है बथुआ…जाने कैसे

તાંદલજા = बथुआ

बथुआ हर घर में खाया जाने वाला आम साग है जिसे आप इसके बिना स्‍वास्‍थ्‍य लाभ जाने ही खा लेते हैं। बथुआ का या तो साग बनता है और या फिर रायता। इसमें बहुत सा विटामिन ए, कैल्‍शियम, फॉस्‍फोरस और पोटैशियम होता है। बथुआ हरा शाक है जो नाइट्रोजन युक्त मिट्टी में फलता-फूलता है। सदियों से इसका उपयोग कई बीमारियों को दूर करने में होता रहा है। एशिया समेत यह अमेरिका, यूरोप और आस्ट्रेलिया में पाया जाता है।

बथुआ आमाशय को बलवान बनाता है, गर्मी से बढ़े हुए यकृत को ठीक करता है। इसकी प्रकृति तर और ठंडी होती है, यह अधिकतर गेहूँ के खेत में गेहूँ के साथ उगता है और जब गेहूँ बोया जाता है, उसी सीजन में मिलता है।

रासायनिक सँघटन :-बथुए में लोहा, पारा, सोना और क्षार पाया जाता है।बथुए का साग जितना अधिक से अधिक सेवन किया जाए, निरोग रहने के लिए उपयोगी है। बथुए का सेवन कम से कम मसाले डालकर करें। नमक न मिलाएँ तो अच्छा है, यदि स्वाद के लिए मिलाना पड़े तो सेंधा नमक मिलाएँ और गाय या भैंस के घी से छौंक लगाएँ।

बथुए का उबाला हुआ पानी अच्छा लगता है तथा दही में बनाया हुआ रायता स्वादिष्ट होता है। किसी भी तरह बथुआ नित्य सेवन करें। बथुआ शुक्रवर्धक है।

बथुए की औषधीय प्रकृति:-

कब्ज : बथुआ आमाशय को ताकत देता है, कब्ज दूर करता है, बथुए की सब्जी दस्तावर होती है, कब्ज वालों को बथुए की सब्जी नित्य खाना चाहिए। कुछ सप्ताह नित्य बथुए की सब्जी खाने से सदा रहने वाला कब्ज दूर हो जाता है। शरीर में ताकत आती है और स्फूर्ति बनी रहती है।

पेट के रोग : जब तक मौसम में बथुए का साग मिलता रहे, नित्य इसकी सब्जी खाएँ। बथुए का रस, उबाला हुआ पानी पीएँ, इससे पेट के हर प्रकार के रोग यकृत, तिल्ली, अजीर्ण, गैस, कृमि, दर्द, अर्श पथरी ठीक हो जाते हैं।

* पथरी हो तो एक गिलास कच्चे बथुए के रस में शकर मिलाकर नित्य पिएँ तो पथरी टूटकर बाहर निकल आएगी। जुएँ, लीखें हों तो बथुए को उबालकर इसके पानी से सिर धोएँ तो जुएँ मर जाएँगी तथा बाल साफ हो जाएँगे।

* मासिक धर्म रुका हुआ हो तो दो चम्मच बथुए के बीज एक गिलास पानी में उबालें। आधा रहने पर छानकर पी जाएँ। मासिक धर्म खुलकर साफ आएगा। आँखों में सूजन, लाली हो तो प्रतिदिन बथुए की सब्जी खाएँ।

पेशाब के रोग : बथुआ आधा किलो, पानी तीन गिलास, दोनों को उबालें और फिर पानी छान लें। बथुए को निचोड़कर पानी निकालकर यह भी छाने हुए पानी में मिला लें। स्वाद के लिए नीबू, जीरा, जरा सी काली मिर्च और सेंधा नमक लें और पी जाएँ।

इस प्रकार तैयार किया हुआ पानी दिन में तीन बार पीएँ। इससे पेशाब में जलन, पेशाब कर चुकने के बाद होने वाला दर्द, टीस उठना ठीक हो जाता है, दस्त साफ आता है। पेट की गैस, अपच दूर हो जाती है। पेट हल्का लगता है। उबले हुए पत्ते भी दही में मिलाकर खाएँ।

* मूत्राशय, गुर्दा और पेशाब के रोगों में बथुए का साग लाभदायक है। पेशाब रुक-रुककर आता हो, कतरा-कतरा सा आता हो तो इसका रस पीने से पेशाब खुल कर आता है।

* कच्चे बथुए का रस एक कप में स्वादानुसार मिलाकर एक बार नित्य पीते रहने से कृमि मर जाते हैं। बथुए के बीज एक चम्मच पिसे हुए शहद में मिलाकर चाटने से भी कृमि मर जाते हैं तथा रक्तपित्त ठीक हो जाता है।

* सफेद दाग, दाद, खुजली, फोड़े, कुष्ट आदि चर्म रोगों में नित्य बथुआ उबालकर, निचोड़कर इसका रस पिएँ तथा सब्जी खाएँ। बथुए के उबले हुए पानी से चर्म को धोएँ। बथुए के कच्चे पत्ते पीसकर निचोड़कर रस निकाल लें। दो कप रस में आधा कप तिल का तेल मिलाकर मंद-मंद आग पर गर्म करें। जब रस जलकर पानी ही रह जाए तो छानकर शीशी में भर लें तथा चर्म रोगों पर नित्य लगाएँ। लंबे समय तक लगाते रहें, लाभ होगा।

* फोड़े, फुन्सी, सूजन पर बथुए को कूटकर सौंठ और नमक मिलाकर गीले कपड़े में बांधकर कपड़े पर गीली मिट्टी लगाकर आग में सेकें। सिकने पर गर्म-गर्म बाँधें। फोड़ा बैठ जाएगा या पककर शीघ्र फूट जाएगा।

* बालों को बनाए सेहतमंद
बालों का ओरिजनल कलर बनाए रखने में बथुआ आंवले से कम गुणकारी नहीं है। सच पूछिए तो इसमें विटामिन और खनिज तत्वों की मात्रा आंवले से ज्यादा होती है। इसमें आयरन, फास्फोरस और विटामिन ए व डी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।* दांतों की समस्या में असरदारबथुए की पत्तियों को कच्चा चबाने से मुंह का अल्सर, श्वास की दुर्गध, पायरिया और दांतों से जुड़ी अन्य समस्याओं में बड़ा फायदा होता है।

*कब्ज को करे दूर
कब्ज से राहत दिलाने में बथुआ बेहद कारगर है। ठिया, लकवा, गैस की समस्या आदि में भी यह अत्यंत लाभप्रद है।

*बढ़ाता है पाचन शक्ति

भूख में कमी आना, भोजन देर से पचना, खट्टी डकार आना, पेट फूलना जैसी मुश्किलें दूर करने के लिए लगातार कुछ सप्ताह तक बथुआ खाना काफी फायदेमंद रहता है।*बवासीर की समस्या से दिलाए निजातसुबह शाम बथुआ खाने से बवासीर में काफी लाभ मिलता है। तिल्ली [प्लीहा] बढ़ने पर काली मिर्च और सेंधा नमक के साथ उबला हुआ बथुआ लें। धीरे-धीरे तिल्ली घट जाएगी।

*नष्ट करता है पेट के कीड़े

बच्चों को कुछ दिनों तक लगातार बथुआ खिलाया जाए तो उनके पेट के कीड़े मर जाते हैं

ડોટ. કોમ ના અમલમાં
===========
જાતાં આવતાં સ્વાસે ડોટ કોમ લીધું
દોટ.કોમ વણ પાયે ઘર કરી ગામ કીધું
સૌને ગમ્યુ ? . ડોટ કોમ દુનિયામાં ઘર કર્યું
ખુપી ગયુ મોઢામોઢ ડોટકોમ સ્ક્રીને કામ કર્યું
દિમાગી ઉપજાઉ સદી એકવીસમી ઘર દ્વારે
યાદી ફરે માઉસમાં હર ખૂણે જૈ આવાસ કરે
દિમાગી ડોટકોમ વણદોટે વિશ્વંમાં વિસ્તરે
ન રોડ ન રસ્તા ડોટકોમ દોડે વિશ્વાસ જગાડી
સંચરે ડોટકોમ ને લાગે જ્યાં સીડી કંડારવા
ભંગાણનાં અસ્થિએ વાયરસી લિબાસ રંજાડે
સીડીની પ્રિન્ટે ફેલાઈ માહિતી નૈસર્ગીક બાગમાં
સ્ક્રીન પ્રિંટી સ્વાભાવ સંધો છે આલાપ અમલમાં
કોમ્પુટર હેલ્ડ-અપ થાય વણ પાવરે  વીજનમાં
ધ્રુજારી ધુણે સોફ્ટ્વેર આઇ.ટી.યુગે માનવ ભવનમાં
===પ્રહેલાદભાઈ પ્રજાપતિ
રિવાઇઝ ઓન 26 /3/2017
આદિ અંત ની સડક પર
==============
મને ફરવા દે મારા સજાયેલા રણ મહી
લક્ષ્યને અરમાન સાથે લીધા ચરણ મહી
મૃગ જળ ની તરસ રહેવા દે ઝાંઝવા મહી
સફરની તલપ આલાપવા દે પગરણ મહી
આવન જાવનના રસ્તાઓ નક્કી અહીં
દોડવાની ઝણસ પહેરવાદે ભમરણ મહીં
સ્મૃતિ એ દોડવાદે ગડમથલ ની કેડી મહીં
ઈશારાના આધાર પલાણવાદે ઈગો મહીં
આદી અંત ની સડક પર ચરણ રઝળવાદે
સમયના સરકતા ઝામ પીવાદે સ્મરણ મહી
=== પ્રહેલાદભાઈ પ્રજાપતિ
રિવાઇઝ ઓન 25 / 3 /2017
शाहजहाँ ने कभी नहीं कहा उसने बनवाया ताजमहल, फिर किसने की इतिहास से छेड़छाड़?
===================================
आप देशवासियों के लिये अपना पूरा जीवन लगा देने वाले भाई राजीव दीक्षित जी #Youtube Channel से जुड़े ! Subscribe Now
बादशाहनामा का विश्लेषण
अर्जुमन्द बानो बेगम या मुमताउल जमानी शाहजहाँ की रानी थी. इसको बादशाहनामा के खण्ड एक के पृष्ठ 402 की अंतिम पंक्ति में भी इसके मुमता-उल-जमानी नाम से ही सम्बोधित किया गया है, न कि मुमताजमहल के नाम से. इतिहासकार इसके जन्म, विवाह एवं मृत्यु की तारीखों पर सहमत नहीं हैं. हमारी कथावस्तु पर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है, अतः हम इसका जन्म सन्‌ 1593 तथा शाहजहाँ से विवाह सन्‌ 1612 मान लेते हैं.
अप्रतिम सुन्दरी नूरजहाँ मिर्जा ग्यास बेग की पौत्री एवं ख्वाजा अबुल हसन वा यामीनउद्‌दौला आसफखान की पुत्री अर्जुमन्द बानो शाहजहाँ की पटरानी नहीं थी. शाहजहाँ का प्रथम विवाह परशिया के शासक शाह इस्मायल सफवी की प्रपौत्री से हुआ था, जबकि मुमताज से सगाई पहले ही हो चुकी थी.
अर्जुमन्द बानों ने 8 पुत्रों एवं 6 पुत्रियों को जन्म दिया था एवं अपनी चौदहवीं सन्तान को जन्म देते समय इसका देहान्त बरहानपुर में 17 जिल्काद 1040 हिजरी तदनुसार 7 जून सन्‌ 1631 को हुआ था. (बादशाहनामा खण्ड, दो पृष्ट 27). इसको वहीं पर ताप्ती नदी के तट पर दफना दिया गया था. यह कब्र भी उपलब्ध है तथा इसकी देख-रेख लगातार वहाँ के निवासियों द्वारा की जाती है. उनका मानना है कि रानी का शव आज भी कब्र में है अर्थात्‌ न कब्र खोदी गई एवं न शव ही निकाला गया.
इसके विपरीत बादशाहनामा खण्ड एक, पृष्ठ 402 की 21वीं लाइन में लिखा है कि शुक्रवार 17 जमादिल अव्वल को हजरत मुमताज-उल-जमानी का पार्थिव शरीर (बरहानपुर से) भेजा गया जो अकबराबाद (आगरा) में 15 जमाद उल सान्या को आया (बादशाहनामा खण्ड एक पृष्ठ 403 की 12वीं पंक्ति).
शव आगरा लाया अवश्य गया था, परन्तु उसे दफनाया नहीं गया था. शव को मस्जिद के छोर पर स्थित बुर्जी (जिसमें बावली है) के पास बाग में रखा गया था जहाँ पर आज भी चार पत्थरों की बिना छत की दीवारें खड़ी हैं. बादशाहनामा खण्ड एक के पृष्ठ 403 की 13वीं पंक्ति के अनुसार अगले वर्ष (कम से कम 6-7 मास बाद) तथा पंक्ति 14 के अनुसार ‘आकाश चुम्बी बड़ी समाधि के अन्दर) शव को दफनाया गया.
बादशाहनामा के उपरोक्त कथनों से एक बात सुस्पष्ट होकर उभरती है कि 15 जमाद उल सानी 1041 हिजरी तदनुसार 8 जनवरी सन्‌ 1632 को जब रानी का पार्थिव शरीर आगरा आया, उस समय उसे दफनाया नहीं गया. क्यों? क्योंकि उसे आकाशचुम्बी बड़ी समाधि के अन्दर दफनाना था जो शायद तैयार (दफनाने योग्य दशा में) नहीं रही होगी.
किसी शव को दफनाने के लिये किसी भवन की आवश्यकता नहीं होती. शव को उसी दिन अथवा सुविधानुसार 3-4 दिन पश्चात्‌ भूमि में गड्‌डा खोदकर दफना दिया जाता है तथा उसे भर दिया जाता है. उस पर कब्र तथा कब्र के ऊपर रौज़ा या मकबरा कभी भी, कितने भी दिनों बाद तथा कितने ही वर्षों तक बनाया जा सकता है.
शव को अगले वर्ष भवन में दफनाने के वर्णन से स्पष्ट है कि इसी बहाने भवन प्राप्त करने का षड्‌यन्त्र चल रहा था तथा मिर्जा राजा जयसिंह पर जिन्हें अपनी पैतृक सम्पत्ति अत्यन्त मूल्यवान्‌ एवं प्रिय थी, उस भवन को शाहजहाँ को हस्तान्तरित कर देने के लिये जोर डाला जा रहा था या मनाया जा रहा था. अथवा यह भी सम्भव है कि भवन को प्राप्त करने के बाद उसमें शव को दफनाने के लिये आवश्यक परिवर्तन किये जा रहे थे. शव को आगरा में भवन मिल जाने की आशा में लाया गया था, परन्तु सम्भवतः राजा जयसिंह को मनाने में समय लगने के कारण उसे बाग में रखना पड़ा. यदि शाहजहाँ ने भूमि क्रय कर ताजमहल बनवाया होता तो शव को एक दिन के लिए भी बाग में रखने की आवश्यकता न होती.
शव को मार्ग तय करने में (बरहानपुर से अकबराबाद तक) लगभग 28 दिन लगे थे. पार्थिव शरीर को लाने राजकुमार गये थे. जाने में भी लगभग इतना ही समय लगा होगा. 2-4 दिन बरहानपुर में शव निकालने तथा वापिसी यात्रा की व्यवस्था में लगे होंगे. अर्थात्‌ 2 मास का समय राजकुमार के जाने के बाद लगा था. शव दफ़नाने की योजना इससे पूर्व बन गई होगी.
इतना समय उपलब्ध होने पर भी शव को (असुरक्षित) 6-7 मास तक बाग में रखने की आवश्यकता क्यों पड़ी? यदि भवन उपलब्ध था तो शव दफनाया क्यों नहीं गया और यदि भवन उपलब्ध नहीं था तो शव लाया क्यों गया? क्या इससे सुस्पष्ट नहीं कि शाहजहाँ को आशा रही होगी कि राजा जयसिंह मना नहीं करेंगे और इसी आशा में राजकुमार को भेज कर शव मँगवा लिया गया, परन्तु जयसिंह ने स्वीकृति नहीं दी. यह भी सम्भव है मिर्जा राजा जयसिंह के मना कर देने पर उन पर दबाव डालने की नीयत से ही शव को लाकर बाग में रख दिया गया हो. शव को दफ़नाने की तारीख न लिखना भी इसी शंका को बल देता है.
शव को बादशाहनामा के अनुसार अगले वर्ष गगनचुम्बी भवन में दफनाया गया. क्या इससे सिद्ध नहीं होता है कि ताजमहल जैसा आज दिखाई देता है उसी में रानी के पार्थिव शरीर को दफ़नाया गया था? अन्यथा क्या कुछ मास में गगनचुम्बी भवन का निर्माण किया जा सकता है, जिसके लिये अनेक लेखकों ने निर्माण काल 8-22 वर्ष तक का (अनुमानित) बताया है? क्या शाहजहाँ के लिये एक वर्ष से कम समय में ताजमहल बनाना सम्भव था? शाहजहाँ ने तो मात्र भवन को साफ करके कब्र बनाई थी एवं कुरान को लिखवाया था. शाहजहाँ ने कभी यह नहीं कहा कि उसने ताजमहल का निर्माण कराया था.
इतने सुस्पष्ट प्रमाणों के बाद भी सम्भव है कुछ पाठकों के मन में परम्परागत भ्रम शेष रह गया हो कि ताजमहल में नीचे वाली भूमितल स्थित कब्र, जिसे वास्तविक कहा जाता है वह भूमि के अन्दर खोद कर बनाई गई है एवं उस कब्र के ऊपर एवं चारों ओर यह विशाल एवं उच्च भवन खड़ा किया गया है वास्तव में तथ्य इसके विपरीत हैं.

जिस समय हम फव्वारों की पंक्तियों के साथ-साथ चलते हुए मुख्य भवन के समीप पहुँचते हैं, वहाँ पर छः सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद ही उस स्थल तक पहुँचते हैं जहाँ पर जूते उतारे जाते हैं. अर्थात्‌ हम लोग भूमितल से लगभग 4 फुट ऊपर जूते उतारते हैं. यहाँ से हम 24 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाते हैं और पुनः 4 सीढ़ियां चढ़कर मुख्य भवन में प्रवेश करते हैं.

इन 24+4 अथवा 28 सीढ़ियों के बदले हम केवल 23 सीढ़ियां उतर कर नीचे की कब्र तक पहुँचते हैं. इस प्रकार भूमितल की कब्र जूते उतारने वाले स्थल से भी कम से कम तीन फुट ऊपर है जो ऊपर बताये अनुसार भूमितल से 4 फुट ऊपर था. इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि नीचे वाली कब्र भी पृथ्वी से 7 फीट ऊँची है जबकि इसे भूमि खोदकर बनाया जाना चाहिए था.

अगले पाठों में पाठकों को इस सत्य से भी परिचित कराया जायेगा कि इस तथाकथित नीचे वाली वास्तविक कब्र के नीचे भी कमरे आज भी स्थित हैं और जिनमें प्रवेश करने के मार्गों को बलात्‌ बन्द किया हुआ है. लेखक इसे सुनी सुनाई बात के आधार पर नहीं लिख रहा है, अपितु इन कमरों का स्वयं प्रत्यक्षदर्शी है.

अभी कुछ अन्य विज्ञ पाठकों की कुछ शंकाओं का समाधान होना रहा गया है. वे हैं बादशाहनामा की अन्तिम 2 पंक्तियों में आये शब्द (1) नींव रखी गई (2) ज्यामितिज्ञ, एवं (3) चालीस लाख रुपये.

यदि ऐसा होता तो उसे सम्बन्धित अन्य कामों का वर्णन भी होता. किसी काम को भी प्रारम्भ करने को भी मुहावरे में नींव रखना कहते हैं यथा ‘जवाहलाल नेहरू ने आधुनिक भारत की नींव रखी थी.’ इसमें भूमि में गड्‌ढा खोदने से कोई तात्पर्य नहीं है, फिर भी यदि कोई इसके शाब्दिक अर्थ अर्थात्‌ खोदने को ही अधिक महत्व देता है तो उनके संतोष के लिये इतना ही पर्याप्त है कि दफनाने के लिये पहले खोदना तो पड़ता ही है चाहे वह छत या फर्श ही क्यों न हो.

रही ज्यामितिज्ञों की बात. ज्यामितिज्ञों की सबसे पहली आवश्यकता कब्र की दिशा निर्धारित करने के लिये ही होती हैं, कब्र हमेशा एक दिशा विशेष में ही बनाई जाती है. इसके अतिरिक्त ताजमहल देखते समय गाइडों ने आपको दिखाया एवं बताया होगा कि कुरान को इस प्रकार लिखा गया है कि कहीं से भी देखिये ऊपर-नीचे के सभी अक्षर बराबर दिखाई देंगे, ऐसा क्योंकर सम्भव हुआ? दूरदर्शी ज्यामितिज्ञों की गणना के आधार पर ही है.

अन्तिम संदेह चालीस लाख रुपयों पर है. यदि शाहजहाँ ने ताजमहल नहीं बनवाया था तो इतनी बड़ी धन राशि का व्यय कैसे हो गया. उस युग में चालीस लाख रुपया बहुत बड़ी राशि थी. बादशाहनामा में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस राशि में कौन-कौन से व्यय सम्मिलित हैं मूलतः शाहजहाँ ने जो व्यय इस सन्दर्भ में किये थे वे इस प्रकार बनते हैं

(1) रानी के शव को बरहानपुर से मंगाना
(2) मार्ग में गरीबों तथा फकीरों को सिक्के बाँटना
(3) भवन के जिन कक्षों में कब्रे हैं उन्हें खाली कराना
(4) शव को दफ़न करना एवं कब्रें बनवाना
(5) भवन के ऊपर-नीचे के सभी कमरों को बन्द कराना
(6) मकराना से संगमरमर पत्थर मंगाना
(7) कुरान लिखाना एवं महरावें ठीक कराना
(8) मजिस्द में फर्श सुधरवाना तथा नमाज़ पढ़ने के लिए आसन बनवाना
(9) बगीचे में सड़क नहर आदि बनवाना
(10) रानी का शव जहाँ रखा गया था वहाँ पर घेरा बनवाना
(11) परिसर के बाहर ऊँचे मिट्‌टी के टीलों को समतल कराना आदि.

पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में यह कहना अति कठिन है कि उन चालीस लाख रुपयों में से उपरोक्त कौन-कौन से कार्य हुए थे. कुछ के अनुसार उक्त सारे कार्यों पर भी चालीस लाख रुपये व्यय नहीं आयेगा. ऊपर इंगित किया जा चुका है कि दरबारी चाटुकार अतिरंजित वर्णन करते थे अर्थात्‌ यदि दो लाख व्यय हुए होंगे तो चालीस लाख बखानेंगे. इस प्रकार मालिक भी प्रसन्न होता था तथा सुनने वाला भी प्रभावित होता था. दूसरा कारण यह भी था कि दो खर्च कर दस बता कर अपना घर भी सरलता से जरा भरा जा सकता था.

जारी …
– प्रतुल वशिष्ठ जी के ब्लॉग से साभार

(आगरा निवासी पंडित कृष्ण कुमार पाण्डेय जी जो अब 80 (लेख 2010-11 में लिखे गए हैं) वर्ष से अधिक आयु के हैं. उनके ‘ताजमहल’ विषयक शोध को क्रमवार देने का मन हो आया जब उनके विचारों को पढ़ा. सोचता हूँ पहले उनके विचारों को ज्यों का त्यों रखूँ और फिर उनके जीवन पर भी कुछ प्रकाश डालूँ. जो हमारी सांस्कृतिक विरासत पर से मिथ्या इतिहास की परतों को फूँक मारकर दूर करने का प्रयास करते हैं प्रायः उनके प्रयास असफल हो जाया करते हैं. इसलिए सोचता हूँ उनकी फूँक को दमदार बनाया जाए और मिलकर उस समस्त झूठे आवरणों को हटा दिया जाए जो नव-पीढ़ी के मन-मानस पर डालने के प्रयास होते रहे हैं. तो लीजिये प्रस्तुत है पंडित कृष्ण कुमार पाण्डेय जी के शब्दों में ….. ताजमहल की असलियत … एक शोध – प्रतुलजी)

માનવ  જાત કેટલી સ્વર્થી છે
================
ભગવાન આગળ આપણ સૌ યાચકો [ ભીખારીઓ ] છીયે છે કોઈ પૂજારી ?
જો ભગવાન પાસે માનવ ઉધ્ધાર, સુખ,સંપત્તિ વૈભવની કળા ગ્યાન શક્તિ
ન હોત તો આપણે યાચકો [ ભીખારીઓ ] તેની પૂજા યાદ કે કરતા ભક્તિ ?
માનવ શક્તિની મર્યાદા શ્રદ્ધાનો અંત જ્યા આવે ત્યાં થી શરૂ થાય દૈવી શક્તિ
પુરાવાનો કોઈ આધાર નહોય ને વણ પુરાવે સાબિત થાય તે  મળે ઈશ્વર શક્તિ
શક્તિ ને કોઈ ચોક્કસ ઘાટ કે ઘર નથી તેજ માં તત્વ અનેક પર્યાયોથી પામતી
ક્યાં કોઈ જોવા મળે છે અવાજનો આકાર ,રંગ ,રૂપ ,વિચારને વાચા થી વાણી
સમદરે હવાના ઘર્ષણે મોંજાને વાણી ને ગતિ ઈચ્છાના પગેરે ઘૂમતો માનવ આદિ
===પ્રહેલાદભાઈ પ્રજાપતિ