सबूत न मिलने पर आज़ादी यानी रिहा किया कितना व्याजबी ? या न्यायिक ?
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न्याय पालिकाकी ये कैसी रीत है की  निर्दोष इंसान को मुजरिम समाज क्र सालो तक बरसो तक
जेल खाने में बंद किया और मुसीबत में दाल दिया  और जब साबुत न मिलने पर उसको रिहा किया  तो क्या न्याय पालिकामे इतना डीएम है की उसके गुजरे हुए बार्स वापस  दे  शके ? क्या
निर्दोष इन्सानको जो नुक्सान हुवा है उसकीक भरपाई कर शके ?  क्या उसकी इज्जत ,गुडविल
समय ये अपनी न्याय पालिकाएं वापस दे शकेगी ?  अगर नही तो उनको दोषित या निर्दोष करार देनेका कोई अधिकार नहीं होना चाहिए ,उन्होंने तो सरकारी खजानेमे से अपनी तनखा लेके  शांत चित और मनसे  बरसो तक केस चलाने वालोंसे सूना उनकी हकीकत ,और वकीलोंने उन लोगोसे फ़ीस वसूल के केस लड़ा दोनों पक्ष के वकीलोंने लेकिन जो मुजरिम है या नहीं है उसका क्या ?
उसको जबतक निकाल नहीं आता हैक तब तक जेलमे सड़नेको ही होता है क्या ? ये एक दन गलत है , हमे कोई दुसरा विकल्प खोजना चाहिए जब तक मुजरिम को कानूनन मुजरिम घोसित
न किया जाय तब तक उसको आज़ादी देनेका कोई प्रावधान होना चाहिए ,सिर्फ जमानत ही काफी है वो पर्याप्त नहीं है या तो दोनों पक्ष के पक्षकारोंको जेल होनी चाय जबतक चुकादा नही आता  या फिर दोनोको अरेस्ट करना चाहिए जब तक चुकादा आता है तभ जाके कुछ न्याय का
सम्मान होगा ,नहीतो केजरीवालकी तरह कई पावरफुल या बीद्धिशाली लोग गलत इल्जाम लगाके या लगवाके इन्सानको जेलमे दवाड़ेगे और जब तक चुकादा आता है तब तक वे उनका
मकसद सिद्ध कर देगे ये न्याय पालिका के लिए  समझनेकी या संशोधन करनेकी जरूरत है
जिससे दोनों पक्ष या पार्टीयोको समान न्याय मिले और कई गलत लोगोसे पक्ष पार्टी या इंसान को
बचा या  जाय और न्यायकि सर्वोपरिता में  आम जनता का विश्वास बढे
===प्रहलादभाई प्रजापति
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