स्वास्थ्य की सभी समस्याओ का हल है ये 12 मुद्राये

आप देशवासियों के लिये अपना पूरा जीवन लगा देने वाले भाई राजीव दीक्षित जी #

1. ब्रह्ममुद्रा

ब्रह्ममुद्रा योग की लुप्त हुई क्रियाओं में से एक महत्त्वपूर्ण मुद्रा है। ब्रह्मा के तीन मुख और दत्तात्रेय के स्वरूप को स्मरण करते हुए व्यक्ति तीन दिशा में सिर घुमायें ऐसी यह क्रिया है अतः इस क्रिया को ब्रह्ममुद्रा कहते हैं।

विधिः वज्रासन या पद्मासन में कमर सीधी रखते हुए बैठें। हाथों को घुटनों पर रखें। कन्धों को ढीला रखें। अब गर्दन को सिर के साथ ऊपर-नीचे दस बार धीरे-धीरे करें। सिर को अधिक पीछे न जाने दें। गर्दन ऊपर-नीचे चलाते वक्त आँखें खुली रखें। श्वास चलने दें। गर्दन को ऊपर-नीचे करते वक्त झटका न दें। फिर गर्दन को चलाते वक्त ठोड़ी और कन्धा एक ही दिशा में लाने तक गर्दन को घुमायें। इस प्रकार गर्दन को 10 बार दाँये-बायें चलायें और अन्त में गर्दन को गोल घुमाना है। गर्दन को ढीला छोड़ कर एक तरफ से धीरे-धीरे गोल घुमाते हुए 10 चक्कर लगायें। आँखें खुली रखें। फिर दूसरे तरफ से गोल घुमायें। गर्दन से चक्कर धीरे-धीरे लगायें। कान को हो सके तो कन्धों से लगायें। इस प्रकार ब्रह्ममुद्रा का अभ्यास करें।

लाभः सिरदर्द, सर्दी, जुकाम आदि में लाभ होता है। ध्यान साधना-सत्संग के समय नींद नहीं आयेगी। आँखों की कमजोरी दूर होती है। चक्कर बंद होते हैं। उलटी-चक्कर, अनिद्रा और अतिनिद्रा आदि पर ब्रह्ममुद्रा का अचल प्रभाव पड़ता है। जिन लोगों को नींद में अधिक सपने आते हैं वे इस मुद्रा का अभ्यास करें तो सपने कम हो जाते हैं। ध्वनि-संवेदनशीलता कम होती है। मानसिक अवसाद (Depression) कम होता है। एकाग्रता बढ़ती है। गर्दन सीधी रखने में सहायता मिलती है

2. लिंग मुद्रा

मौसम के परिवर्तन के कारण संक्रमण से कई बार वाइरल इंफेक्शन के कारण हमारे गले व फेफड़ों में जमने वाली एक श्लेष्मा होती है जो खांसी या खांसने के साथ बाहर आता है। यह फायदेमंद और नुकसानदायक दोनों है। इसे ही कफ कहा जाता है। अगर आप भी खांसी या जुकाम से परेशान है तो बिना दवाई लिए भी रोज सिर्फ दस मिनट इस मुद्रा के अभ्यास से कफ छुटकारा पा सकते हैं।

लिंग मुद्राः बाएं हाथ का अंगूठा सीधा खडा कर दाहिने हाथ से बाएं हाथ कि अंगुलियों में परस्पर फँसाते हुए दोनों पंजों को ऐसे जोडें कि दाहिना अंगूठा बाएं अंगूठे को बहार से कवर कर ले,इस प्रकार जो मुद्रा बनेगी उसे लिंग अंगुष्ठ मुद्रा कहेंगे।

लाभः – अंगूठे में अग्नि तत्व होता है.इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में गर्मी बढऩे लगती है. शरीर में जमा कफ  तत्व सूखकर नष्ट हो जाता है।सर्दी जुकाम,खांसी इत्यादि रोगों में यह बड़ा लाभदायी होता है, कभी यदि शीत प्रकोप में आ जाए और शरीर में ठण्ड से कपकपाहट होने लगे तो इस मुद्रा का प्रयोग लाभदायक होता है। रोज दस मिनट इस मुद्रा को करने से बहुत कफ होने पर भी राहत मिलती है। कफ शीघ्र ही सुख जाता है। साथ ही जरा सा सेंधा नमक धीरे धीरे चूसने से लाभ होता है। सुबह कोमल सूर्यकिरणों में बैठके दायें नाक से श्वास लेकर सवा मिनट रोकें और बायें से छोड़ें। ऐसा 3-4 बार करें। इससे कफ की शिकायतें दूर होंगी।

3. शून्य मुद्रा

शून्य मुद्राः सबसे लम्बी उँगली (मध्यमा) को अंदपर की ओर मोड़कर उसके नख के ऊपर वाले भाग पर अँगूठे का गद्दीवाला भाग स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः कान का दर्द मिट जाता है। कान में से पस निकलता हो अथवा बहरापन हो तो यह मुद्रा 4 से 5 मिनट तक करनी चाहिए।

4. पृथ्वी मुद्रा

पृथ्वी मुद्राः कनिष्ठिका यानि सबसे छोटी उँगली को अँगूठे के नुकीले भाग से स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः शारीरिक दुर्बलता दूर करने के लिए, ताजगी व स्फूर्ति के लिए यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक है। इससे तेज बढ़ता है।

5. ज्ञान मुद्रा

ज्ञान मुद्राः तर्जनी अर्थात प्रथम उँगली को अँगूठे के नुकीले भाग से स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

विधिकिसी शांत और शुद्ध वातावरण वाले स्थान पर कंबल आदि बिछाकर पद्मासन या सुखासन में बैठ जाएं। अब अपने दोनो हाथों को घुटनों पर रख लें। अंगूठे के पास वाली तर्जनी उंगली (इंडेक्स फिंगर) के ऊपर के पोर को अंगूठे के ऊपर वाले पोर से मिलाकर हल्का सा दबाव दें। हाथ की बाकी की तीनों उंगलियां बिल्कुल एक साथ लगी हुई और सीधी रहनी चाहिए। अंगूठे और तर्जनी उंगली के मिलने से जो मुद्रा बनती है उसे ही ज्ञान मुद्रा कहतें है। ध्यान लगाते समय सबसे ज्यादा ज्ञान मुद्रा का इस्तेमाल किया जाता है।

लाभः मानसिक रोग जैसे कि अनिद्रा अथवा अति निद्रा, कमजोर यादशक्ति, क्रोधी स्वभाव आदि हो तो यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक सिद्ध होगी। यह मुद्रा करने से पूजा पाठ, ध्यान-भजन में मन लगता है। इस मुद्रा का प्रतिदिन 30 मिनठ तक अभ्यास करना चाहिए।

हमने कई बार अधिकांश लोगों को यह कहते हुए सुना है कि दिमाग नहीं चल रहा। जब मानसिक तनाव बढ़ता है तो हमारा दिमाग उस उलझन में ठीक से सोच नहीं पाता और हम ठीक से निर्णय नहीं ले पाते। ऐसे में हमेशा डर बना रहता है कि हम कोई गलत निर्णय ना ले लें।

इस डर से बचने का एक ही उपाय है कि हमारा दिमाग ठीक से कार्य करे। दिमाग को ठीक से चलाने के लिए प्रतिदिन सुबह-सुबह ज्ञान-मुद्रा का प्रयोग करना एक बेहद फायदेमंद और कारगर उपाय हो सकता है। ज्ञान मुद्रा की मदद से हमारा दिमाग दौडऩे लगेगा। इस मुद्रा से दिमाग को सही और ज्यादा से ज्यादा प्रखर चेतना मिलेगी और वह पहले की बजाय अधिक बेहतर और तेज गति से सटीक कार्य करने में समर्थ बन जाएगा।

6. सूर्यमुद्रा

सूर्यमुद्राः अनामिका अर्थात सबसे छोटी उँगली के पास वाली उँगली को मोड़कर उसके नख के ऊपर वाले भाग को अँगूठे से स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः शरीर में एकत्रित अनावश्यक चर्बी एवं स्थूलता को दूर करने के लिए यह एक उत्तम मुद्रा है।

7. वरुण मुद्रा

वरुण मुद्राः मध्यमा अर्थात सबसे बड़ी उँगली के मोड़ कर उसके नुकीले भाग को अँगूठे के नुकीले भाग पर स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः यह मुद्रा करने से जल तत्व की कमी के कारण होने वाले रोग जैसे कि रक्तविकार और उसके फलस्वरूप होने वाले चर्मरोग व पाण्डुरोग (एनीमिया) आदि दूर हो जाते है।

8. प्राण मुद्रा

प्राण मुद्राः कनिष्ठिका, अनामिका और अँगूठे के ऊपरी भाग को परस्पर एक साथ स्पर्श करायें। शेष दो उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः यह मुद्रा प्राण शक्ति का केंद्र है। इससे शरीर निरोगी रहता है। आँखों के रोग मिटाने के लिए व चश्मे का नंबर घटाने के लिए यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक है।

9. वायु मुद्रा

वायु मुद्राः तर्जनी अर्थात प्रथम उँगली को मोड़कर ऊपर से उसके प्रथम पोर पर अँगूठे की गद्दी स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः हाथ-पैर के जोड़ों में दर्द, लकवा, पक्षाघात, हिस्टीरिया आदि रोगों में लाभ होता है। इस मुद्रा के साथ प्राण मुद्रा करने से शीघ्र लाभ मिलता है।

 

10. अपानवायु मुद्रा

अपानवायु मुद्राः अँगूठे के पास वाली पहली उँगली को अँगूठे के मूल में लगाकर अँगूठे के अग्रभाग की बीच की दोनों उँगलियों के अग्रभाग के साथ मिलाकर सबसे छोटी उँगली (कनिष्ठिका) को अलग से सीधी रखें। इस स्थिति को अपानवायु मुद्रा कहते हैं। अगर किसी को हृदयघात आये या हृदय में अचानक पीड़ा होने लगे तब तुरन्त ही यह मुद्रा करने से हृदयघात को भी रोका जा सकता है।

लाभः हृदयरोगों जैसे कि हृदय की घबराहट, हृदय की तीव्र या मंद गति, हृदय का धीरे-धीरे बैठ जाना आदि में थोड़े समय में लाभ होता है। पेट की गैस, मेद की वृद्धि एवं हृदय तथा पूरे शरीर की बेचैनी इस मुद्रा के अभ्यास से दूर होती है आवश्यकतानुसार हर रोज़ 20 से 30 मिनट तक इस मुद्रा का अभ्यास किया जा सकता है।

11. ध्यान मुद्रा

लाभः स्नायुमंडल को बल मिलता है। चंचल मन एकाग्र होता है। शारीरिक व मानसिक तनाव दूर करने में मदद मिलती है।

विधिः पद्मासन या सुखासन में बैठें। बायीं हथेली पर दायीं हथेली रखें। दोनों हाथों के अँगूठे तर्जनी (अँगूठे के नजदीक की उँगली) से मिलायें। सिर, गर्दन और रीढ़ की हड्डी सीधी रेखा में रहें। आँखें और होंठ सहज रूप से बंद करें। मनःचक्षुशों के आगे अपने इष्टदेव,सदगुरुदेव की प्रतिमा को लायें।

12. अनुशासन मुद्रा

अनुशासन के बिना जीवन सफल नहीं हो सकता। हर व्यक्ति अपने विवेक से अनुशासित रहता है। जब तक विवेक प्रबुद्ध और जागरूक नहीं हो जाता है। ऐसे में सफल होने के लिए विवेक का जागृत होना जरूरी है। इसके लिए नीचे लिखी योगमुद्रा सबसे अच्छा उपाय है।

विधि– अनुशासन मुद्रा के लिए तर्जनी यानी इंडैक्स फिंगर अंगुली को सीधा रखें। शेष तीन अंगुलियों-कनिष्ठा छोटी अंगुली अनामिका   (रिंग फिंगर) और मध्यमा (मिडिल फिंगर) को अंगुठे के साथ मिलाएं। इस तरह बनने वाली मुद्रा को अनुशासन मुद्रा कहा गया है।

आसन- पद्मासन व सुखासन में इस मुद्रा का प्रयोग किया जा सकता है।

समय- रोज आठ मिनट से प्रारंभ करें। एक महिने तक रोज एक-एक मिनट बढ़ाएं।

लाभ- इस मुद्रा को करने से व्यक्ति अनुशासित होने लगता है। नेतृत्व क्षमताऔर कार्य क्षमता बढ़ती है। अपने आप में पौरुष का अनुभव होता है।

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