Archive for એપ્રિલ, 2017


भूल हो गई केजरीका माफ़ी नामा = एक नै गर्भित साजिस की और
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कभी  सोंपने  ज़हर देना बंद किया ?  ऐसा हिस्ट्री में नहीं बना वो काम केजरीजी करने जारह है
यकीन  होना या करना लोगोकी दूसरी मुर्खामि होगी बद इंसान  अपना दाव बदल रहा है लोग
उनको समज ले उसीमे लोगोकी भलाई होगी ,सत्ता में नहीं आनेकी बच्चोकी कसम खा के सत्ता पाई ,बँगला गाडी नहीं लेके बड़े बड़े बंगले लिए ,तन्खा नहीं लेंगे बोलके डबल ट्राइबल तन्खा पाई
भ्रचस्तचार नहीं करंगे बोलके भ्रस्टचार की साड़ी हदें पार करदी संपत्ति नहीं जमाएने बोलके परोक्ष रीतसे संपत्ति जमाई सरकारी सभी सवालते लेके सत्तामे मजे ली है ,अब १० ०  चूहे खाके
बिल्ली हज पढ़ने को बोल रही है ,क्या लोग भरोसा करेंगे ? अगर किया तो एक मूर्खता ही होगी
बन्दर कितना भी बूढ़ा क्यों नहो ,वो गुलाट  मारना नहीं भूलता
ગુજરાતીમેં  એક કહાવત હૈ ફાટે પણ ફીટે નહિ પડી પટોળે  ભાત
===प्रहलादभाई  प्रजापति

Pramod Agrawal <pka_ur@yahoo.com>:
🚩निर्दोष साध्वी प्रज्ञा को 9 साल में जमानत, रेप के आरोपी गायत्री प्रजापति को 40 दिन में ही जमानत क्यों?

🚩2008 मालेगांव बम विस्फोट में साजिश रचने की बनाई गई आरोपी #साध्वी_प्रज्ञा_सिंह ठाकुर को मंगलवार (25 अप्रैल) को मुंबई उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति रंजीत मोरे और न्यायमूर्ति शालिनी फनसाल्कर जोशी की खंड पीठ ने कहा, ‘साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की अपील को मंजूरी दी जाती है । याची (साध्वी) को पाँच #लाख रुपये की जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है। प्रसाद पुरोहित की ओर से दायर अपील को खारिज किया जाता है ।’
🚩 #न्यायमूर्ति मोरे ने आदेश में कहा है कि पहली नजर में साध्वी के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है ।
🚩एनआईए जाँच एजेंसी के मुताबिक, विस्फोट को दक्षिणपंथी संगठन अभिनव भारत ने कथित तौर पर अंजाम दिया था और पुरोहित और प्रज्ञा सहित कुल 11 लोग इस मामले में अभी #जेल में हैं ।
🚩एनआईए ने पुरोहित की जमानत की अर्जी का विरोध किया ।
🚩पुरोहित ने दलील दी थी कि एनआईए कुछ आरोपियों को आरोपमुक्त करने में भेदभाव कर रही है और एजेंसी ने उसे मामले में बलि का बकरा बनाया है ।

🚩जब #एनआईए ने साफ कह दिया है कि दक्षिणपंथी संगठन ने मालेगांव ब्लास्ट किया है फिर कर्नल पुरोहित को क्यों जमानत देने का विरोध कर रही है?

🚩गौरतलब है कि 29 सितंबर 2008 को #मालेगांव में एक बाइक में बम लगाकर विस्फोट किया गया था जिसमें आठ लोगों की मौत हुई थी और तकरीबन 80 लोग जख्मी हो गए थे। साध्वी और पुरोहित को 2008 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वे जेल में हैं।

🚩अब जनता सवाल कर रही है कि भयंकर यातनाऐं देकर 9 साल से साध्वी प्रज्ञा को जेल में रखा गया, रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई, जेल में कैंसर हो गया और अब एनआईए और न्यायालय बोलता है कि उनके खिलाफ कोई मामला बनता नही है, तो 9 साल से जो साध्वी प्रज्ञा जी को बिना सबूत #जेल में रखा, उनका जो समय गया, उनका स्वास्थ्य गया वो क्या न्यायालय लौटा पायेगा?

मीडिया ने उनकी जो खूब बदनामी की क्या वो इज्जत मीडिया दोबारा लौटा पायेगी ?

🚩ऐसे ही कुछ समय पूर्व स्वामी #असीमानन्द को 8 साल के बाद जेल से रिहा किया गया उनको भी बिना सबूत ही जेल में रखा गया था ।

🚩लेकिन वहीं दूसरी ओर #उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के दौरान कैबिनेट मंत्री गैंग रेप के आरोपी गायत्री प्रजापति को 40 दिन के बाद आज (25 अप्रैल) को लखनऊ की पॉस्को कोर्ट ने जमानत दे दी है। पूर्व मंत्री के अलावा अन्य 2 आरोपी को भी जमानत दी है।

🚩महिला ने #गायत्री_प्रजापति पर आरोप लगाया है कि उसके साथ #गैंगरेप और नाबालिक बेटी के साथ भी यौन शोषण किया। प्रजापति और 6 अन्य लोगों के ख‍िलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ था। गायत्री को 15 मार्च 2017 को गिरफ्तार किया गया था 25 अप्रैल को जमानत मिल गई ।

🚩वहीं दूसरी ओर केवल छेड़छाड़ी के आरोप में हिन्दू संत बापू आसारामजी 4 साल से जेल में बन्द है, जबकि उनको मेडिकल में क्लीनचिट भी मिल चुकी है और कॉल डिटेल्स से भी पता चला है कि जिस समय #छेड़छाड़ी का आरोप लगाया है उस समय तो वो अपने किसी मित्र से फोन पर बात कर रही थी और बापू आसारामजी भी किसी अन्य कार्यक्रम में व्यस्त थे और उनको षडयंत्र के तहत फंसाने के सैकड़ों सबूत भी मिले हैं लेकिन फिर भी जमानत क्यों नही मिल पा रही है???

क्या कानून सबके लिए समान है…???

🚩क्यों नेता, अभिनेता, अमीरों को शीघ्र जमानत दी जाती है लेकिन हिंदुस्तान में ही हिन्दू संत #बापू #आसारामजी को 4 साल से और अन्य संतों और कार्यकर्ताओं को क्यों जमानत नहीं दी जा रही है ??

क्या यही हमारी उत्तम न्याय व्यवस्था है..???

🚩देश के 9000 हजार करोड़ लेकर भागने वाले #विजय_माल्या को तो केवल 3 घण्टे में ही जमानत मिल गई ।

🚩इन निर्दोष हिन्दू #साधु-संतो के खिलाफ एक भी सबूत नहीं है फिर भी इनको सालों से जेल में रखा जा रहा है, #मीडिया द्वारा खूब बदनामी की जाती है।

आखिर ऐसा क्यों ???

🚩क्या इनका यही गुनाह है कि इन्होंने धर्मान्तरण पर रोक लगाई और गाँव-गाँव, नगर-नगर जाकर #देश-विदेश में हिन्दू संस्कृति का प्रचार प्रसार किया । जनता में राष्ट्र भक्ति जगाई ।

🚩क्या इनका यही गुनाह था कि इन्होंने विदेशी कंपनियों से लोहा लिया और लोगों को #स्वदेशी की ओर मोड़ा।

🚩क्या इनका यही गुनाह था कि विदेशी कल्चर का #बहिष्कार करवाया और भारतीय संस्कृति की ओर आकर्षित किया ।

🚩या ये गुनाह है कि इन्होंने अनेक गौशालायें खुलवाकर #कत्लखाने जाती गायों को बचाया और लोगों को गाय माता को बचाने के प्रति जाग्रत किया ।

🚩लगता है इनका #हिन्दू_संत होना ही सबसे बड़ा गुनाह है क्योंकि इस देश में सिर्फ हिन्दू #संतों और कार्यकर्ताओं से ही उनके मौलिक अधिकार छीन लिए गए हैं।

🚩एक बात तो पक्की हो गई कि जो भी हिंदुत्वनिष्ठ आगे आकर हिन्दू संस्कृति के प्रचार प्रसार में लगेगा उन पर #राष्ट्रविरोधी तत्वों द्वारा ऐसे ही हमला होगा ।

🚩अब हिन्दू का जगने का समय आ गया है। हिन्दुत्वनिष्ठों के साथ हो रहे अन्याय पर अब हिन्दू चुप नहीं बैठेगा ।

एक अल्लाह की बात करने वाले मुसलमानो का इस्लाम खुद 73 टुकड़ो मे बंटा हुआ है ,जरूर पढ़ें ।

मुसलमानों की सामाजिक सरंचना धर्म और कुरआन के निर्देशों पर आधारित है, इस्लाम जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता और यह बतलाता है की जन्म, वंश और स्थान के आधार पर सभी मुसलमान बराबर हैं |

मुसलमानों में हिन्दुओ जैसी कोई जाति व्यवस्था नहीं है । पर यह एक सैद्धांतिक बात है | परन्तु जब हम मुसलमानों को व्यवहार की द्रष्टि से देखते हैं तो पता चलता है कि किसी न किसी रूप में मुस्लिम समाज में भी इस्लाम शिक्षा के विरुद्ध जाति व्यवस्था की जड़ें बहुत गहरे तक जाती हैं और सभी मुसलमान खुद को एक नहीं मानते हैं।

इस्लाम धर्म से संबद्ध विभिन्न वर्गों व समुदायों के उलेमाओं से अक्सर यह सुनने को मिलता है कि इस्लाम धर्म में विभिन्न आस्थाओं, विश्वासों व अंकीदों से जुड़े हुए 73 अलग-अलग वर्ग या फिरके हैं । मुसलमान होने के बावजूद इस प्रकार से वर्ग, समुदाय या फिरकों के रूप में इस्लाम धर्म को मानने वालों का विभिन्न वर्गों में विभाजित होना स्वयं अपने-आप में इस बात का प्रमाण है कि इन अलग-अलग वर्गों में कहीं न कहीं धार्मिक, ऐतिहासिक अथवा विश्वास संबंधी कोई न कोई मतभेद अवश्य है ।

केवल इतना ही नहीं, विवाह इत्यादि में भी ये एक-दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करने में कुछ सामजिक और जातीय नियमों का अलग–अलग तरह से पालन करते हैं। कुछ ऐसा प्रतीत होता है कि भूगोलिक प्रजातीय, जनजातीय और राजनैतिक विभेदों के कारण मुस्लिम समाज में भी सामाजिक व्यवस्था अलग–अलग है। भारतीय मुसलमानों पर अरब/ तुर्की और फारस के मुसलमानों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव दिखता है ।

परंतु इन सब मतभेदों के बावजूद सभी वर्ग बड़े ही गर्व के साथ स्वयं को मुसलमान व इस्लाम धर्म का मानने वाला कहते आ रहे हैं, एक निराकार अल्लाह पर सभी विश्वास करते हैं, हजरत मोहम्‍मद को लगभग सभी वर्गों के लोग अपना आंखिरी पैंगंबर या आंखिरी नबी मानते हैं और सभी अपने धर्मग्रंथ “कुरान शरीफ” को अल्लाह की पवित्र किताब के रूप में स्वीकार करते हैं।

इस तरह विश्व में इस्लाम के सभी अनुयायी ख़ुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन इस्लामिक क़ानून (फ़िक़ह) और इस्लामिक इतिहास को अपनी-अपनी समझ के आधार पर कई पंथों में बंटे रखे हैं | बड़े पैमाने पर या संप्रदाय के आधार पर देखा जाए तो मुसलमानों को दो हिस्सों-सुन्नी और शिया में बांटा जा सकता है और शिया और सुन्नी भी कई फ़िरक़ों या पंथों में बंटे हुए हैं |

बात अगर शिया-सुन्नी की करें तो दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि अल्लाह एक है, मोहम्मद साहब उनके दूत हैं और क़ुरान आसमानी किताब यानी अल्लाह की भेजी हुई किताब है |लेकिन दोनों समुदाय में विश्वासों और पैग़म्बर मोहम्मद की मौत के बाद उनके उत्तराधिकारी के मुद्दे पर गंभीर मतभेद हैं | इन दोनों के इस्लामिक क़ानून भी अलग-अलग हैं

सुन्नी

सुन्नी या सुन्नत का मतलब उस तौर तरीक़े को अपनाना है जिस पर पैग़म्बर मोहम्मद (570-632 ईसवी) ने ख़ुद अमल किया हो और इसी हिसाब से वे सुन्नी कहलाते हैं | एक अनुमान के मुताबिक़, दुनिया के लगभग 80-85 प्रतिशत मुसलमान सुन्नी हैं जबकि 15 से 20 प्रतिशत के बीच शिया हैं

सुन्नी मुसलमानों का मानना है कि पैग़म्बर मोहम्मद के बाद उनके ससुर हज़रत अबु-बकर (632-634 ईसवी) मुसलमानों के नए नेता बने, जिन्हें ख़लीफ़ा कहा गया | इस तरह से अबु-बकर के बाद हज़रत उमर (634-644 ईसवी), हज़रत उस्मान (644-656 ईसवी) और हज़रत अली (656-661 ईसवी) मुसलमानों के नेता बने | इन चारों को ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन यानी सही दिशा में चलने वाला कहा जाता है | इसके बाद से जो लोग आए, वो राजनीतिक रूप से तो मुसलमानों के नेता कहलाए लेकिन धार्मिक एतबार से उनकी अहमियत कोई ख़ास नहीं थी

जहां तक इस्लामिक क़ानून की व्याख्या का सवाल है सुन्नी मुसलमान मुख्य रूप से चार समूह में बंटे हैं | हालांकि पांचवां समूह भी है जो इन चारों से ख़ुद को अलग कहता है

इन पांचों के विश्वास और आस्था में बहुत अंतर नहीं है, लेकिन इनका मानना है कि उनके इमाम या धार्मिक नेता ने इस्लाम की सही व्याख्या की है | दरअसल सुन्नी इस्लाम में इस्लामी क़ानून के चार प्रमुख आधार हैं

आठवीं और नवीं सदी में लगभग 150 साल के अंदर चार प्रमुख धार्मिक नेता पैदा हुए | उन्होंने इस्लामिक क़ानून की व्याख्या की और फिर आगे चलकर उनके मानने वाले उस फ़िरक़े के समर्थक बन गए

ये चार इमाम थे-

इमाम अबू हनीफ़ा (699-767 ईसवी)

इमाम शाफ़ई (767-820 ईसवी)

इमाम हंबल (780-855 ईसवी)

इमाम मालिक (711-795 ईसवी)

हनफ़ी

इमाम अबू हनीफ़ा के मानने वाले हनफ़ी कहलाते हैं | इस फ़िक़ह या इस्लामिक क़ानून के मानने वाले मुसलमान भी दो गुटों में बंटे हुए हैं | एक देवबंदी हैं तो दूसरे अपने आप को बरेलवी कहते हैं

देवबंदी और बरेलवी

दोनों ही नाम उत्तर प्रदेश के दो ज़िलों, देवबंद और बरेली के नाम पर है

दरअसल 20वीं सदी के शुरू में दो धार्मिक नेता मौलाना अशरफ़ अली थानवी (1863-1943) और अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी (1856-1921) ने इस्लामिक क़ानून की अलग-अलग व्याख्या की |अशरफ़ अली थानवी का संबंध दारुल-उलूम देवबंद मदरसा से था, जबकि आला हज़रत अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी का संबंध बरेली से था

मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही और मौलाना क़ासिम ननोतवी ने 1866 में देवबंद मदरसे की बुनियाद रखी थी | देवबंदी विचारधारा को परवान चढ़ाने में मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही, मौलाना क़ासिम ननोतवी और मौलाना अशरफ़ अली थानवी की अहम भूमिका रही है | उपमहाद्वीप यानी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले अधिकांश मुसलमानों का संबंध इन्हीं दो पंथों से है

देवबंदी और बरेलवी विचारधारा के मानने वालों का दावा है कि क़ुरान और हदीस ही उनकी शरियत का मूल स्रोत है लेकिन इस पर अमल करने के लिए इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है | इसलिए शरीयत के तमाम क़ानून इमाम अबू हनीफ़ा के फ़िक़ह के अनुसार हैं

वहीं बरेलवी विचारधारा के लोग आला हज़रत रज़ा ख़ान बरेलवी के बताए हुए तरीक़े को ज़्यादा सही मानते हैं | बरेली में आला हज़रत रज़ा ख़ान की मज़ार है जो बरेलवी विचारधारा के मानने वालों के लिए एक बड़ा केंद्र है

दोनों में कुछ ज़्यादा फ़र्क़ नहीं लेकिन कुछ चीज़ों में मतभेद हैं | जैसे बरेलवी इस बात को मानते हैं कि पैग़म्बर मोहम्मद सब कुछ जानते हैं, जो दिखता है वो भी और जो नहीं दिखता है वो भी | वह हर जगह मौजूद हैं और सब कुछ देख रहे हैं

वहीं देवबंदी इसमें विश्वास नहीं रखते | देवबंदी अल्लाह के बाद नबी को दूसरे स्थान पर रखते हैं लेकिन उन्हें इंसान मानते हैं | बरेलवी सूफ़ी इस्लाम के अनुयायी हैं और उनके यहां सूफ़ी मज़ारों को काफ़ी महत्व प्राप्त है जबकि देवबंदियों के पास इन मज़ारों की बहुत अहमियत नहीं है, बल्कि वो इसका विरोध करते हैं

मालिकी

इमाम अबू हनीफ़ा के बाद सुन्नियों के दूसरे इमाम, इमाम मालिक हैं जिनके मानने वाले एशिया में कम हैं | उनकी एक महत्वपूर्ण किताब ‘इमाम मोत्ता’ के नाम से प्रसिद्ध है

उनके अनुयायी उनके बताए नियमों को ही मानते हैं | ये समुदाय आमतौर पर मध्य पूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीका में पाए जाते हैं

शाफ़ई

शाफ़ई इमाम मालिक के शिष्य हैं और सुन्नियों के तीसरे प्रमुख इमाम हैं | मुसलमानों का एक बड़ा तबक़ा उनके बताए रास्तों पर अमल करता है, जो ज़्यादातर मध्य पूर्व एशिया और अफ्रीकी देशों में रहता है

आस्था के मामले में यह दूसरों से बहुत अलग नहीं है लेकिन इस्लामी तौर-तरीक़ों के आधार पर यह हनफ़ी फ़िक़ह से अलग है | उनके अनुयायी भी इस बात में विश्वास रखते हैं कि इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है

हंबली

सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, मध्य पूर्व और कई अफ्रीकी देशों में भी मुसलमान इमाम हंबल के फ़िक़ह पर ज़्यादा अमल करते हैं और वे अपने आपको हंबली कहते हैं | सऊदी अरब की सरकारी शरीयत इमाम हंबल के धार्मिक क़ानूनों पर आधारित है | उनके अनुयायियों का कहना है कि उनका बताया हुआ तरीक़ा हदीसों के अधिक करीब है

इन चारों इमामों को मानने वाले मुसलमानों का यह मानना है कि शरीयत का पालन करने के लिए अपने अपने इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है | सल्फ़ी, वहाबी और अहले हदीससुन्नियों में एक समूह ऐसा भी है जो किसी एक ख़ास इमाम के अनुसरण की बात नहीं मानता और उसका कहना है कि शरीयत को समझने और उसका सही ढंग से पालन करने के लिए सीधे क़ुरान और हदीस (पैग़म्बर मोहम्मद के कहे हुए शब्द) का अध्ययन करना चाहिए इसी समुदाय को सल्फ़ी और अहले-हदीस और वहाबी आदि के नाम से जाना जाता है | यह संप्रदाय चारों इमामों के ज्ञान, उनके शोध अध्ययन और उनके साहित्य की क़द्र करता है

लेकिन उसका कहना है कि इन इमामों में से किसी एक का अनुसरण अनिवार्य नहीं है | उनकी जो बातें क़ुरान और हदीस के अनुसार हैं उस पर अमल तो सही है लेकिन किसी भी विवादास्पद चीज़ में अंतिम फ़ैसला क़ुरान और हदीस का मानना चाहिए

सल्फ़ी समूह का कहना है कि वह ऐसे इस्लाम का प्रचार चाहता है जो पैग़म्बर मोहम्मद के समय में था | इस सोच को परवान चढ़ाने का सेहरा इब्ने तैमिया(1263-1328) और मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब(1703-1792) के सिर पर बांधा जाता है और अब्दुल वहाब के नाम पर ही यह समुदाय वहाबी नाम से भी जाना जाता है

मध्य पूर्व के अधिकांश इस्लामिक विद्वान उनकी विचारधारा से ज़्यादा प्रभावित हैं | इस समूह के बारे में एक बात बड़ी मशहूर है कि यह सांप्रदायिक तौर पर बेहद कट्टरपंथी और धार्मिक मामलों में बहुत कट्टर है | सऊदी अरब के मौजूदा शासक इसी विचारधारा को मानते हैं

अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन भी सल्फ़ी विचाराधारा के समर्थक थे

सुन्नी बोहरा

गुजरात, महाराष्ट्र और पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मुसलमानों के कारोबारी समुदाय के एक समूह को बोहरा के नाम से जाना जाता है | बोहरा, शिया और सुन्नी दोनों होते हैं

सुन्नी बोहरा हनफ़ी इस्लामिक क़ानून पर अमल करते हैं जबकि सांस्कृतिक तौर पर दाऊदी बोहरा यानी शिया समुदाय के क़रीब हैं

अहमदिया

हनफ़ी इस्लामिक क़ानून का पालन करने वाले मुसलमानों का एक समुदाय अपने आप को अहमदिया कहता है | इस समुदाय की स्थापना भारतीय पंजाब के क़ादियान में मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने की थी | इस पंथ के अनुयायियों का मानना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ख़ुद नबी का ही एक अवतार थे

उनके मुताबिक़ वे खुद कोई नई शरीयत नहीं लाए बल्कि पैग़म्बर मोहम्मद की शरीयत का ही पालन कर रहे हैं लेकिन वे नबी का दर्जा रखते हैं | मुसलमानों के लगभग सभी संप्रदाय इस बात पर सहमत हैं कि मोहम्मद साहब के बाद अल्लाह की तरफ़ से दुनिया में भेजे गए दूतों का सिलसिला ख़त्म हो गया है

लेकिन अहमदियों का मानना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ऐसे धर्म सुधारक थे जो नबी का दर्जा रखते हैं

बस इसी बात पर मतभेद इतने गंभीर हैं कि मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग अहमदियों को मुसलमान ही नहीं मानता | हालांकि भारत, पाकिस्तान और ब्रिटेन में अहमदियों की अच्छी ख़ासी संख्या है | पाकिस्तान में तो आधिकारिक तौर पर अहमदियों को इस्लाम से ख़ारिज कर दिया गया है

शिया

शिया मुसलमानों की धार्मिक आस्था और इस्लामिक क़ानून सुन्नियों से काफ़ी अलग हैं | वह पैग़म्बर मोहम्मद के बाद ख़लीफ़ा नहीं बल्कि इमाम नियुक्त किए जाने के समर्थक हैं उनका मानना है कि पैग़म्बर मोहम्मद की मौत के बाद उनके असल उत्तारधिकारी उनके दामाद हज़रत अली थे | उनके अनुसार पैग़म्बर मोहम्मद भी अली को ही अपना वारिस घोषित कर चुके थे लेकिन धोखे से उनकी जगह हज़रत अबू-बकर को नेता चुन लिया गया शिया मुसलमान मोहम्मद के बाद बने पहले तीन ख़लीफ़ा को अपना नेता नहीं मानते बल्कि उन्हें ग़ासिब कहते हैं | ग़ासिब अरबी का शब्द है जिसका अर्थ हड़पने वाला होता है

उनका विश्वास है कि जिस तरह अल्लाह ने मोहम्मद साहब को अपना पैग़म्बर बनाकर भेजा था उसी तरह से उनके दामाद अली को भी अल्लाह ने ही इमाम या नबी नियुक्त किया था और फिर इस तरह से उन्हीं की संतानों से इमाम होते रहे

आगे चलकर शिया भी कई हिस्सों में बंट गए

इस्ना अशरी

सुन्नियों की तरह शियाओं में भी कई संप्रदाय हैं लेकिन सबसे बड़ा समूह इस्ना अशरी यानी बारह इमामों को मानने वाला समूह है | दुनिया के लगभग 75 प्रतिशत शिया इसी समूह से संबंध रखते हैं | इस्ना अशरी समुदाय का कलमा सुन्नियों के कलमे से भी अलग है

उनके पहले इमाम हज़रत अली हैं और अंतिम यानी बारहवें इमाम ज़माना यानी इमाम महदी हैं | वो अल्लाह, क़ुरान और हदीस को मानते हैं, लेकिन केवल उन्हीं हदीसों को सही मानते हैं जो उनके इमामों के माध्यम से आए हैं

क़ुरान के बाद अली के उपदेश पर आधारित किताब नहजुल बलाग़ा और अलकाफ़ि भी उनकी महत्वपूर्ण धार्मिक पुस्तक हैं | यह संप्रदाय इस्लामिक धार्मिक क़ानून के मुताबिक़ जाफ़रिया में विश्वास रखता है | ईरान, इराक़, भारत और पाकिस्तान सहित दुनिया के अधिकांश देशों में इस्ना अशरी शिया समुदाय का दबदबा है

ज़ैदिया

शियाओं का दूसरा बड़ा सांप्रदायिक समूह ज़ैदिया है, जो बारह के बजाय केवल पांच इमामों में ही विश्वास रखता है | इसके चार पहले इमाम तो इस्ना अशरी शियों के ही हैं लेकिन पांचवें और अंतिम इमाम हुसैन (हज़रत अली के बेटे) के पोते ज़ैद बिन अली हैं जिसकी वजह से वह ज़ैदिया कहलाते हैं

उनके इस्लामिक़ क़ानून ज़ैद बिन अली की एक किताब ‘मजमऊल फ़िक़ह’ से लिए गए हैं | मध्य पूर्व के यमन में रहने वाले हौसी ज़ैदिया समुदाय के मुसलमान हैं

इस्माइली शिया

शियों का यह समुदाय केवल सात इमामों को मानता है और उनके अंतिम इमाम मोहम्मद बिन इस्माइल हैं और इसी वजह से उन्हें इस्माइली कहा जाता है | इस्ना अशरी शियों से इनका विवाद इस बात पर हुआ कि इमाम जाफ़र सादिक़ के बाद उनके बड़े बेटे इस्माईल बिन जाफ़र इमाम होंगे या फिर दूसरे बेटे

इस्ना अशरी समूह ने उनके दूसरे बेटे मूसा काज़िम को इमाम माना और यहीं से दो समूह बन गए | इस तरह इस्माइलियों ने अपना सातवां इमाम इस्माइल बिन जाफ़र को माना | उनकी फ़िक़ह और कुछ मान्यताएं भी इस्ना अशरी शियों से कुछ अलग है

दाऊदी बोहरा

बोहरा का एक समूह, जो दाऊदी बोहरा कहलाता है, इस्माइली शिया फ़िक़ह को मानता है और इसी विश्वास पर क़ायम है | अंतर यह है कि दाऊदी बोहरा 21 इमामों को मानते हैं

उनके अंतिम इमाम तैयब अबुल क़ासिम थे जिसके बाद आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा है | इन्हें दाई कहा जाता है और इस तुलना से 52वें दाई सैय्यदना बुरहानुद्दीन रब्बानी थे | 2014 में रब्बानी के निधन के बाद से उनके दो बेटों में उत्तराधिकार का झगड़ा हो गया और अब मामला अदालत में है

बोहरा भारत के पश्चिमी क्षेत्र ख़ासकर गुजरात और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं जबकि पाकिस्तान और यमन में भी ये मौजूद हैं | यह एक सफल व्यापारी समुदाय है जिसका एक धड़ा सुन्नी भी है

खोजा

खोजा गुजरात का एक व्यापारी समुदाय है जिसने कुछ सदी पहले इस्लाम स्वीकार किया था | इस समुदाय के लोग शिया और सुन्नी दोनों इस्लाम मानते हैं

ज़्यादातर खोजा इस्माइली शिया के धार्मिक क़ानून का पालन करते हैं लेकिन एक बड़ी संख्या में खोजा इस्ना अशरी शियों की भी है | लेकिन कुछ खोजे सुन्नी इस्लाम को भी मानते हैं | इस समुदाय का बड़ा वर्ग गुजरात और महाराष्ट्र में पाया जाता है | पूर्वी अफ्रीकी देशों में भी ये बसे हुए हैं

नुसैरी

शियों का यह संप्रदाय सीरिया और मध्य पूर्व के विभिन्न क्षेत्रों में पाया जाता है | इसे अलावी के नाम से भी जाना जाता है | सीरिया में इसे मानने वाले ज़्यादातर शिया हैं और देश के राष्ट्रपति बशर अल असद का संबंध इसी समुदाय से है

इस समुदाय का मानना है कि अली वास्तव में भगवान के अवतार के रूप में दुनिया में आए थे | उनकी फ़िक़ह इस्ना अशरी में है लेकिन विश्वासों में मतभेद है | नुसैरी पुर्नजन्म में भी विश्वास रखते हैं और कुछ ईसाइयों की रस्में भी उनके धर्म का हिस्सा हैं

इन सबके अलावा भी इस्लाम में कई छोटे छोटे पंथ पाए जाते हैं | विश्व विजय का स्वप्न देखने वाले पहले इस्लाम के सही स्वरूप की एक मत से व्याख्या करें तो शायद ज्यादा अच्छा होगा

एक हत्यारे व् बलात्कारी को “ग़ाज़ी बाबा” बताकर, बहराइच में उसकी कब्र के आगे मत्था टेकते है हिन्दू


जिसने जिन्दा रहते हुए दारूल इस्लाम की स्थापना के लिए लाखों हिन्दुओँ का क़त्ल किया हो, क्या मरने के बाद वो हिन्दुओँ की मनोकामनाएं पूरी करेगा

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हम दोस्त के घर से वापस आने के लिए पैकिंग कर रहे थे, तभी मेरे दोस्त के पिताजी ने कहा बेटा कुछ दिन और रुक जाते अभी तो आपने बहराइच भी नही घुमा है, कल हम सभी बहु को लेकर “गाज़ी बाबा” की दरगाह पर जायेंगे आप लोग भी चलो, आप लोग बहराइच तक आये हो तो कम से कम गाज़ी

बाबा की दरगाह तो देखकर ही जाओ,

चूँकि मेरे दोस्तों ने तो मना किया की और कहा ‘अंकल हम फिर कभी आएंगे बहराईच तब गाज़ी बाबा की दरगाह घूम कर जायेंगे, अभी हमें जाना होगा’

लेकिन मैने अंकल से कहा की हम सभी कल आप लोगों के साथ जाएँगे।

मैंने रात में कई बार सोचा की इन सभी को सैयद सालार गाज़ी की सच्चाई समझाऊँ लेकिन फिर दिमाग़ में वोही बातें अटैक करने लगीं की हिंदुओ को इतनी आसानी से समझ में कहाँ आता है, अगर इतनी ही आसानी से हिन्दू समझ जाते तो हिन्दू 1200 साल ग़ुलाम कैसे रहते ।

अगले दिन सुबह मैने उन लोगों को सैयद सालार गाज़ी की सच्चाई समझाने की हल्की सी कोशिश की, और यह जानने की कोशिश की उन लोगों की उस मज़ार से क्या आस्था है लेकिन वो हिन्दू परिवार बहुत ही सहष्णु और सेक्युलर वादी था, उनके अनुसार वो दरगाह हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक था

अब हम सभी अपनी अपनी गाड़ियों में बैठकर जा रहे थे , मै थोड़ा उदास भी था क्योंकि मुझे ये देखकर दुःख हो रहा था की हिंदू इतना मूर्ख कैसे हो सकता है जो निरंतर मुस्लिमों के चँगुल में फँसता ही चला जा रहा हो, जो इनके स्लो पोइशन सूफिज्म के फ़ैलाये जाल से बाहर निकलने की कोशिश भी नही करता, आज हिन्दू जिस गाज़ी की पूजा कर रहा है उसके इतिहास को जानने की कोशिस भी नही करता।

दरगाह से काफ़ी दूरी पहले ही गाड़ियाँ रोक दी गयीं सभी लोग दरगाह जाने लगे, वहाँ जाकर पता चला की कितने हिन्दू आज भी अंध विश्वासी बन मज़ारों पर माथा टेक रहे हैं कुछ महंगी महँगी चादर चढ़ा रहे हैं और मन्नतें माँग रहे हैं, लेकिन वो हिन्दू ये नही जानते की जिसने जिन्दा रहते हुए केवल इस्लाम का परचम फ़ैलाने के लिए लाखों हिंदुओ को मारा हो वो मरने के बाद हिंदुओ की मन्नतें कैसे पूरी कर सकता है।

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अब हम सभी वापिस आ रहे थे की रास्ते में एक शमसान घाट मिला मैंने अपनी गाड़ी शमसान घाट पर रोक दी और मैं माथा टेकते हुए शमसान घाट के अंदर गया अब मैंने सभी लोगों को बुलाया लेकिन कोई भी शमसान घाट में आने को तैयार नही था , फिर मैंने अंकल को बोला की अंकल जी प्लीज् अंदर आओ, आप सभी को कुछ बताना चाहता हूँ, अब अंकल जी बोले बेटा अगर शमसान घाट के अंदर आऊँगा तो फिर जाकर नहाना पड़ेगा और यहाँ भूत रहते हैं,

मैंने कहा अंकल जी आप को नहाना तो वैसे भी पड़ेगा क्योंकि आप ऑलरेडी एक शमसान घाट होकर आये हो और कब्र में लेटे हुए भूत से मन्नतें माँग कर आये हो।

आप आओ तो सही आपको कुछ बताना चाहता हूँ, अब एक एक करके सभी लोग शमसान घाट के अंदर आ गए,

अब मैंने बोलना शुरू किया की अंकल आप बताओ

“क्या कोई मुस्लिम जिसनें दारुल इस्लाम के लिए लाखों हिंदुओ का क़त्ल किया हो, क्या वो मरने के बाद हिंदुओ की मन्नतें पूरी करेगा”

आप जानते हो की सैयद सालार गाज़ी की क़ब्र के सामने हिंदुओ का माथा टेकना उन लाखों हिन्दू वीर योद्धाओं के साथ धौखा होगा जिन्होंने उस गाज़ी से लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिए,

आज के हिंदुओं का गाज़ी के सामने सर झुकाना उन लाखों माँओं के साथ विश्वासघात होगा जिन माँओं ने गाज़ी को रोकने के लिए अपने लाल खोए, उन अर्धांगिनियों के साथ विश्वासघात होगा जिन्होंने उस गाज़ी से लड़ने के लिये अपना सिंदूर उजाड़ा।

लाखों हिंदुओ को मारने वाले गाज़ी के सामने सर झुकाने से बेहतर, मैं शमसान घाट की उन आत्मा के सामने सर झुकाना बेहतर समझूँगा जिसनें अपने जीवन में किसी का क़त्ल नही किया हो,

फिर मैंने पूछा आप सभी क्या जानते हो “सैयद सालार गाज़ी” के बारे में कौन था वो, तो सुनों मैं आपको उसकी सच्चाई बताता हूँ

“आप सभी महमूद गज़नवी (गज़नी) के बारे में तो जानते ही होंगे, वही मुस्लिम आक्रांता जिसने सोमनाथ पर 17 बार हमला किया और भारी मात्रा में सोना हीरे-जवाहरात आदि लूट कर ले गया था।

महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर आखिरी बार सन् 1024 में हमला किया था तथा उसने व्यक्तिगत रूप से सामने खड़े होकर शिवलिंग के टुकड़े-टुकड़े किये और उन टुकड़ों को अफ़गानिस्तान के गज़नी शहर की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में सन् 1026 में भी लगवाया।

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उसी लुटेरे महमूद गजनवी का ही भांजा था सैयद सालार मसूद उर्फ़ आपका गाज़ी बाबा,

यह बड़ी भारी सेना लेकर सन् 1031 में भारत आया। सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी बाबा एक सनकी किस्म का धर्मान्ध इस्लामिक आक्रान्ता था।

महमूद गजनवी तो सिर्फ़ लूटने के लिये भारत आता था,

लेकिन सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी बाबा भारत में विशाल सेना लेकर आया था उसका मक़सद भारतभूमि को “दारुल-इस्लाम” बनाकर रहना था, और इस्लाम का प्रचार पूरे भारत में करना था जाहिर है कि तलवार के बल पर।

सैयद सालार मसूद अपनी सेना को लेकर “हिन्दुकुश” पर्वतमाला को पार करके पाकिस्तान (आज के) के पंजाब में पहुँचा, जहाँ उसे पहले हिन्दू राजा आनन्द पाल शाही का सामना करना पड़ा, जिसका उसने आसानी से सफ़ाया कर दिया।

मसूद के बढ़ते कदमों को रोकने के लिये सियालकोट के राजा अर्जुन सिंह ने भी आनन्द पाल की मदद की लेकिन इतनी विशाल सेना के आगे वे बेबस रहे। मसूद धीरे-धीरे आगे बढ़ते-बढ़ते राजपूताना और मालवा प्रांत में पहुँचा, जहाँ राजा महिपाल तोमर से उसका मुकाबला हुआ, और उसे भी मसूद ने अपनी सैनिक ताकत से हराया। एक तरह से यह भारत के विरुद्ध पहला जेहाद ही युद्ध था जो भारत को इस्लामिक मुल्क़ बनाने के लिए हुआ था। सैयद सालार मसूद सिर्फ़ लूटने की नीयत से भारत नही आया था बल्कि बसने राज्य करने और इस्लाम को फ़ैलाने का उद्देश्य लेकर भारत आया था।

पंजाब से लेकर उत्तरप्रदेश के गांगेय इलाके को रौंदते, लूटते, हत्यायें-बलात्कार करते सैयद सालार मसूद अयोध्या के नज़दीक स्थित बहराइच पहुँचा, जहाँ उसका इरादा एक सेना की छावनी और राजधानी बनाने का था। इस दौरान इस्लाम के प्रति उसकी सेवाओं को देखते हुए उसे “गाज़ी बाबा” की उपाधि दी गई।

इस मोड़ पर आकर भारत के इतिहास में एक विलक्षण घटना घटित हुई, ज़ाहिर है कि इतिहास की पुस्तकों में जिसका कहीं जिक्र नहीं किया गया है।

इस्लामी खतरे को देखते हुए पहली बार भारत के उत्तरी इलाके के हिन्दू राजाओं ने एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसमें लगभग 20 राजा अपनी सेना सहित शामिल हुए और उनकी संगठित संख्या सैयद सालार मसूद की विशाल सेना से भी ज्यादा हो गई।

जैसी कि हिन्दुओ की परम्परा रही है, सभी राजाओं के इस गठबन्धन ने सालार मसूद के पास संदेश भिजवाया कि यह पवित्र धरती हमारी है और वह अपनी सेना के साथ चुपचाप भारत छोड़कर निकल जाये लेकिन सालार मसूद ने माँग ठुकरा दी उसके बाद ऐतिहासिक बहराइच का युद्ध हुआ, जिसमें संगठित हिन्दुओं की सेना ने सैयद मसूद की सेना को धूल चटा दी।

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इस भयानक युद्ध के बारे में इस्लामी विद्वान शेख अब्दुर रहमान चिश्ती की पुस्तक मीर-उल-मसूरी में विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने लिखा है कि मसूद सन् 1033 में बहराइच पहुँचा, तब तक हिन्दू राजा संगठित होना शुरु हो चुके थे।

यह भीषण रक्तपात वाला युद्ध मई-जून 1033 में लड़ा गया। युद्ध इतना भीषण था कि सैयद सालार मसूद के किसी भी सैनिक को जीवित नहीं जाने दिया गया, यहाँ तक कि युद्ध बंदियों को भी मार डाला गया… मसूद का समूचे भारत को इस्लामी रंग में रंगने का सपना अधूरा ही रह गया।

बहराइच का यह युद्ध 14 जून 1033 को समाप्त हुआ।

जब फ़िरोज़शाह तुगलक बहराइच आया और मसूद के बारे में जानकारी पाकर वह बहुत प्रभावित हुआ और उसने उसकी कब्र को एक विशाल दरगाह और गुम्बज का रूप देकर सैयद सालार मसूद को “एक धर्मात्मा” के रूप में प्रचारित करना शुरु किया, एक ऐसा इस्लामी धर्मात्मा जो भारत में इस्लाम का प्रचार करने आया था।

इस इस्लामिक आक्रांता के आगे आप सभी माथा टेकते हो, जिसने अपने जीवित रहते हुए लाखों हिंदुओ को मारा हो क्या वो मरने के बाद हिन्दुओँ की मनोकामनाएं पूरी करेगा,

किसी के सामने सर झुकाने से पहले उसके इतिहास और चरित्र को तो जान लो फिर उसे सम्मान दो, जो भारतभूमि में भारत को सम्मान नही देता और हिन्दू धर्म को सम्मान नही देता, मैं उनके सामने अपना सर नही झुकाता।

अब सभी लोग शाँत थे तभी किरण भाभी ( जिनकी कल ही शादी हो कर आयी थी) ने कहा अशोक भैया आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने सैयद सालार मसूद उर्फ़ गाज़ी की सच्चाई बतायी, अब मैं अपने जीवन में कभी भी गाज़ी की दरगाह नही आऊँगी और नही कभी किसी को इस पिशाच की दरगाह पर आने दूँगी।

अब हम सभी अपनी अपनी गाड़ियों में वापिस घर जाने लगे, मेरे दोस्त मुझसे पूछ रहे थे की भाई तू हिंदुत्व को लेकर इतनी टेंशन क्यों लेता है, मैंने भी कहा की ख़ुद को और धर्म को बचाने के लिए किसी ना किसी को तो आगे आना ही होगा सो मैं इस युद्ध में एक सिपाही हूँ जो अपनी अंतिम साँस तक धर्म के लिए लड़ेगा।

અટ્ક્ળોના આશીર્વાદ
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જખ્મોનો જ્યા  બને છે  કારભાર
ત્યાં સહાનુભુતિ રળે છે આવકાર

ખરું છે  જે  છોડી જાય છે દુનિયા
અતીત મ્હાલે છે  રાખી દરકાર

રાહમાં મળે અટક્ળોના આશીર્વાદ
વિશાદ જયાં ધારે ન થવાના પડકાર

આમ હોય તો નિરાશા ત્યજી દે  ઘર
પણ જરૂરી હશે આશાનો કારભાર

અટકળે આશીર્વાદ  હોય જ્યા છે શંકા
ત્યાં પડેછે  બે વિચારો વચ્ચે  તકરાર
=== પ્રહેલાદભાઈ પ્રજાપતિ
રિવાઇઝ ઓન 29 / 4 / 2017

મોરનિન્ગ વોક

મોરનિન્ગ વોક
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ગળતી ઉમરના ધસારા સામે દોડે લેવા ટક્કર
કુત્રીમ યુવાનીઓ જજુમતી સવાર રેસે ચાલકો

નિદ્રા દ્વાર ઉગાડે રાતનો આરોગી પાછલો પહોર
સડકો સજાવે નિરમળ હવાએ જનાર વીર ચાલકો

ઉગાડે માથે તો કોઇ ખુલ્લા પગે ને બન્ધ મુઠીએ
ધારદાર ચાલ સાથે ઊંડા શ્વાસ લૈ દોડે સૌ ચાલકો

ડાયાબીટીસનાં લક્ષણે શરીર મપાયછે રોગનાં દર્દે
કરવા સર સ્વાસ્થને દોડે સૌ મધુ પ્રમયો લૈ ચાલકો

વહેલા પહોરની ગુન્જે આરતી,ભજન ઘન્ટનાદે થાળ
પરોઢ મળસ્કે દોડે સ્વપનો સ્વાસ્થ્યનાં સમય ચાલકે

ઘંટીઓ દળવું ભૂલી લોટ નેતરાં ભૂલ્યા હાથ વલોણે ‘ ઘી ‘
‘પાણિયારાં ભૂલ્યા બેડાં વણ પાણીએ નળે બંધાયાં  નીર

બપોરી ખાણે બ્રેક ફાસ્ટ ઉઠે નારીઓ માથે ચડે જયાં દિ
સ્થૂળકાય શરીરે જીવાય જંકફૂડ મધરાતી ખાણાં ખવાય
===પ્રહેલાદભાઈ પ્રજાપતિ
રિવાઇઝ ઓન 27 /4 / 2017

जवाब जरूर दीजिए
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ये कौन सा खुदा है जिसको अपनी बेटी अपनी बहु लगती है
ये कौनसा धर्म है जिसमे मासूम बेटियों को हवसके लिए मारी जाती है
ये कौनसे इंसान है जो इंसानियतके हर लब्ज को ख़तम करते है
ये कौनसे लोग है जो नारी को अपना खेत समझते है और बच्चे पैदा करनेकी फैक्ट्री समझते है
ये कौनसी जाती है नारी को गुलाम और अपनी ऐयासीके लिए अपनी रखैल बनाके रखते है
ये कौनसा दानवोका झुंड है जो पहले दूसरोंसे बादमे आपसमे एक दुसरेके खुनके प्यासे है
ये कौनसी जाती है जो नारीको अपने पैर की जूती समझते है
ये कौनसी जाती के लोग है जो आपसमे जन्मसे सगे भाई  बहन होते है जहा लड़कियों बचपनमे
अपने भाईको भाईजान और जैसे जवान होते है तो सगे भाईको अपना [ पति ] यानी अपना
शोहर बनाते है
ये कौनसा ना लायक खुदा है जो ये सब अवैध काम इन्सानसे करवाता है
इस जहाँमे जानवर जैसी अबोला प्रजाति भी कुछ नियमोंका पालन करती है ये कौनसी जाती है जो  लोग जानवरसे भी गई है ,उनसे तो जानवर भी अच्छी प्रजाति है
===प्रहलादभाई प्रजापति

આનંદે નક્સલીઓ ગદ્દારીઓ
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દેશમાં વિદેશી નાણાંની રેલમછેલ નેતાએ નક્સલીએ
જવાન શહિદ સીમાએ રક્ત રંજિત આનંદે ગદ્દારીઓ
==પ્રહલાદભાઈ પ્રજાપતિ

સબન્ધો

સબન્ધો
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બપોરે કોલુએ શેરડી જેમ પિસાય છે મીઠા સબન્ધો
હરાયા ઢોરે ખેતર ભેળી ધણ ચારી ખાય સીધા સબંધો
સીમા લાધી ત્યાં ઓળખાયા નજીકના વેરી સબન્ધો
સ્વાર્થના સિંહાસને છડી પોકારી રાજવટું ઘેરે સબન્ધો
કડવાશના ગ્રહણે તૂટે  મારા પણું લૂંટે ઘરના સબન્ધો
શીતળતા થકી બંધાયા  ઝેરના પારખે તૂટયા સબન્ધે
આ શુ કે પેલુ શુ નાં વિચારે ધોળાયા સહિયારા સબન્ધો
બે કાંઠા જોડતી કડીમાં સળંગ દૂરના બન્ધાયા સબન્ધો
સ્વપ્નોની યાદીમાં પૂરાય હકીકતે હંમેશા નંદવાય સંબંધો
આયખે પડેલી ગાંઠે વંચાય તકલીફે ઓળખાય  સબન્ધો
===પ્રહેલાદભાઈ પ્રજાપતિ
રિવાઇઝ ઓન 24 /4 /2017
सेक्युलर नहीं राक्षस थे मुस्लिम शासक, हिन्दू ने घुटने नहीं टेके, संघर्ष किया इसलिए आज भी हिन्दू है।
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नोट : ध्यान और दिमाग लगाकर, शंका हो तो गूगल का इस्तेमाल करते हुए, पोस्ट पढ़िए ये वाला
तो समझ में आएगा, बस 2 मिनट में आपको सभी सेक्युलरों की असलियत पता चलने वाली है
कांग्रेस और उसके गुर्गे यानि सेक्युलर तत्व, मुस्लिम हमलावरों, मुगलों के बचाव में अक्सर तर्क देते है की, मुस्लिम शासक बर्बर नहीं थे, वो तो सेक्युलर थे
और न ही किसी का जबरन धर्मान्तरण करवाया और न ही जुल्म किये
सेक्युलर तत्व कहते है की, मुस्लिमो ने 1000 साल भारत पर राज किया, फिर भी यहाँ हिन्दू है, कैसे है
अगर मुस्लिम शासक बर्बर थे ???
इस तरह कांग्रेस और उसके गुर्गे यानि सेक्युलर और वामपंथी तत्व एक आम हिन्दू को मुर्ख बनाते है, और उसे भी सेक्युलर में परिवर्तित कर देते है
अब नोट करना शुरू कीजिये
* पहली चीज तो ये की, किसी भी मुस्लिम शासक ने पुरे भारत पर राज कभी नहीं किया, और 1000 साल
ये मूर्खतापूर्ण मजाक है
* मुग़ल केवल उत्तर भारत के शासक थे, वो भी पुरे उत्तर भारत के नहीं, यहाँ तक की औरंगजेब के शासन में जब मुग़लो की सीमा सबसे अधिक बड़ी थी, उत्तर  भारत में ही बुंदेलखंड में हिन्दुओ का राज था, लाहौर इत्यादि में हिन्दू सिखों का राज था, कश्मीर में हिन्दू राजा था
राजस्थान गुजरात मध्य प्रदेश में हिन्दू राजा थे, ओडिसा में मुग़ल थे ही नहीं, महाराष्ट्र में बड़े भूमि पर शिवाजी महाराज का राज था
किसी भी मुस्लमान को भारत का शासक नहीं कहा जा सकता
अकबर के समय जितना बड़ा मुग़ल राज था, उस से कहीं अधिक बड़ा और समृद्ध राज था विजयनगर साम्राज्य और ये बात स्वयं आईने अकबरी लिखने वाले अबुल फज़ल की किताब में लिखी हुई है, किसी हिन्दू पर तो भरोसा मत ही करो, खैर
* हिन्दू आज भी भारत में मौजूद है, पर किसी मुस्लिम शासक की दया से मौजूद नहीं है
और न ही उसके सेकुलरिज्म के कारण, मुस्लिम शासक कभी सेक्युलर नहीं रहे, वो हमेशा राक्षस रहे है
बलात्कारी, लुटेरे, हत्यारे रहे है
हिन्दू इसलिए आज भी हिन्दू है क्योंकि हिन्दू ने घुटने नहीं टेके, हिन्दू में दम था, उसने संघर्ष किया
जिन हिन्दुओ को जान प्यारी थी वो धर्मान्तरित कर मुसलमान हो गए, और  जिनको आन प्यारी थी वो कुर्बान हुए, और आज उन्ही के वंशज हिन्दू है
राणा कुम्भा ने युद्ध किया, महाराणा प्रताप ने युद्ध किया, छत्रसाल ने युद्ध किया, सिख गुरुओं ने युद्ध किया, रंजीत सिंह ने युद्ध किया, शिवाजी महाराज ने युद्ध किया और मुगलों को हराया, बाजीराव पेशवा ने युद्ध किया और मुगलों अफगानों को पेशावर तक काटा, गाजर मूली की तरह काटा
पेसाब के लिए भी 1758 में मुग़ल शासक लाल किले से बाहर नहीं आया, मुग़ल साम्राज्य 1758 में केवल लाल किला दिल्ली तक सिमित रह गया, और बाजीराव ने लाल किले के बाहर “गौरी शंकर” मंदिर बनवाया
जो आज भी दिल्ली में लाल किले के सामने शान से भव्यता से खड़ा है
भैया हिन्दू में दम था, उसने संघर्ष किया, मानते है बहुत से हिन्दू धर्मान्तरित हुए, हमारे देश के टुकड़े 1947 में किये गए, पर मुसलमानो ने नहीं किये टुकड़े बल्कि सेक्युलर गाँधी-नेहरू ने टुकड़े किये
हिन्दू बस सेकुलरिज्म के कारण कमजोर और मुर्ख सा दिखता है
पर असल में हिन्दू में दम है, और इसलिए उसकी हस्ती आज भी मौजूद है, आज के हिन्दू में सेकुलरिज्म घुसा है इसलिए कमजोर दीखता है, पर ये वही हिन्दू है जो महाराणा प्रताप, शिवजी, पेशवा का वंशज है
जागेगा तो सेकुलरिज्म मिटा के रख दिया जायेगा